अजेय लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल Ncert Full सार


Wednesday, 16 October 2019



अजेय लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल  Ncert Full सार 


- सत्यकाम विद्यालंकार 


 सरदार वल्लभभाई पटेल



लेखक - परिचय


                  श्री सत्यकाम जी का जन्म 14 अगस्त 1905 में लाहौर में हुआ था । उन्होंने अनेकानेक विषया पर लिखा है । सामाजिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक आदि सभी विषयों पर लेखक की लेखनी प्रखरता स चला हा सन 1950 से 1960 तक धर्मयुग का , 1980 से 1962 तक नवनीत का सम्पादन किया था । आपकी प्रतिनिधि रचनाएँ है - जीवनसाथी ( 1948 ) . चरित्र - निर्माण ( 1948 ) , राष्ट्रपुरुष ( 1951 ) , सीमा ( 1957 ) , गीतांजलि ( 1950 ) , सफल जीवन ( 1968 ) , वेद पुष्पांजलि ( 1977 ) , त्राग्वेद संहिता कृति 9 भागों में आदि ।



 पाठ - परिचय 


                            सत्यकाम विद्यालंकार द्वारा लिखित ' सरदार वल्लभभाई पटेल से सम्बंधित संकलित अंश जीवनी है । इसमें लेखक ने सरदार पटेल के जन्म विकास , साहस को बड़ी ईमानदारी से पाठकों के समक्ष रखा है । लेखक ने इस अंश में वल्लभभाई पटेल की संघर्षप्रियता , अदभुत सहिष्णुता , सत्याग्रही चेतना को स्पष्ट करते हुए उनके राजनीतिक जीवन का वर्णन भी किया है । पटेल जी कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे और भारत के गृहमंत्री भी । अंग्रेजों ने जब भारत को स्वाधीन किया तब पटेल जी ने साहस के साथ छोटे - छोटे राज्यों को बड़े राज्यों में मिला दिया और विद्रोह करने वाले स्थानों पर सैन्य शक्ति का प्रयोग करके अपनी कुशलता और दूरदर्शिता का परिचय दिया । सम्पूर्ण अंश वल्लभभाई पटेल के जीवन की विविध साहसपूर्ण घटनाओं से परिपूर्ण है । उसमें पर्याप्त सजीवता और स्पष्टता है ।
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       भारत को स्वाधीन किसने कराया ? इस प्रश्न के उत्तर में शायद सन्देह हो सकता है , क्योंकि भारत को स्वाधीन कराने में बहुत सी शक्तियों का सम्मिलित प्रभाव काम कर रहा था . किन्त लारत के स्वाधीन हो जाने के बाद लगभग 600 स्वतंत्र देशी राज्यों को भारतीय संघ में सम्मिलित करके देश को एक सुसंगठित राज्य बनाने का श्रेय पूर्णतया सरदार वल्लभभाई पटेल को दिया जा सकता हा और मजे की बात यह है कि इन 600 राज्यों को भारत की केन्द्रीय सत्ता के अधीन करने में हैदराबाद के अतिरिक्त कहीं भी न तो सेना का ही प्रयोग किया गया और न किसी प्रकार का रक्तपात या उपद्रव ही हुआ । हैदराबाद में भी सेना का प्रयोग नाममात्र को हुआ । हताहतों की संख्या बिल्कुल नगण्य रही । यह चमत्कारपूर्ण सफलता सरदार पटेल की दृढ़ता और नीति कुशलता का परिणाम थी ।

कुछ लोगों ने उन्हें  पटेल के कार्य की गुरुता को देखते मार्क में वही अन्तर था , जो भारत रह सार्थक था । उनके संकल्प कर लेते थे , वह होकर ही रहता था । * होता था । इसीलिए उनका अद्भुत स शीघ्र ही उन भारत का विस्मार्क ' कहा है । किन्तु भारत की विशालता और सरदार पटेल के कार्य की , हए बिस्मार्क की सफलताएँ बहुत छोटी जान पड़ती है । पटेल और बिस्मार्क में वही अन्तर में ही स्वर्गव और जर्मनी में है । सरदार पटेल लौहपुरुष कहे जाते थे ।

उनका यह विशेषण पूरी तरह सार्थक था । उन भेज दिया । में बज की सी दृढ़ता थी । जिस काम को कर लेने का वह निश्चय कर लेते थे , वह होकर ही यह कम बोलते थे । पर जो कछ वह बोलते थे , उसके प्रत्येक शब्द में अर्थ होता था । इसी एक एक शब्द ध्यान से सुना जाता था । उनके अनुयायी और उनके विरोधी , दोनों ही उनके शब्दों की मूल्य को पहचानते थे । करने जाते । घटनाओं का चक्र जिस प्रकार चला , उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि यदि सरदार पर भारत की राजनैतिक संक्रांति के उस अवसर पर न होते , तो भारत स्वाधीन होने के कुछ ही समय बाद संवाद था । बीसियों छोटे - बड़े टुकड़ों में विभक्त हो गया होता । उस दशा में इतने बलिदानों के बाद प्राप्त की गईरहे स्वतन्त्रता का कोई मूल्य न रह जाता । इसे देश का सौभाग्य ही कहना चाहिए कि ऐसे विकट समय में पत्नी के स्वा ऐसा सुयोग्य कर्णधार प्राप्त हो सका । उन्हें ' लौहपु वल्लभभाई का जन्म गुजरात के नादियाड़ ताल्लुके के करमसद गाँव में 31 अक्टूबर , 1875 ई . को हुआ आपके पिता श्री झवेर भाई एक साधारण किसान थे ।

वह साहसी , धार्मिक और दयालु स्वभाव । Hisil , चालक और दयालु स्वभाव पुत्री छोड़क के थे । संभवतः 1857 ई . के विद्रोह में वह खेतीबारी छोड़ कर शस्त्र लेकर विद्रोहियों के साथ हो गये । थे । विद्रोह असफल रहा । काफी समय तक अपनी जान बचाने के लिए वह एक स्थान से भाग कर दूसरे स्थानों पर जाते रहे । तीन वर्ष पश्चात जब वह एकाएक अपने गाँव वापस लौटे , तब तक गाँव के लोग पत्र - व्यवहा उन्हें मृत समझ चुके थे ।

साहसी और संघर्ष - प्रिय 


          ऐसे साहसी पिता के पुत्र वल्लभभाई में साहस की मात्रा अधिक होनी स्वाभाविक ही थी । इसके साथ ही वल्लभभाई में संगठन की क्षमता भी बचपन से ही थी । जब वह विद्यालय में पढ़ते थे . तब भी वह विद्यार्थियों के साथ होने वाले अन्यायों के विरुद्ध हड़ताल इत्यादि का संगठन करते रहते थे । अध्यापकों के साथ झड़प हो जाने के कारण उन्हें एक दो बार विद्यालय से निकाला भी गया । अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रवृत्ति आपके रक्त में ही थी ।
   प्रारंभिक शिक्षा नादियाड़ में समाप्त करने के बाद आप बड़ौदा के हाई स्कूल में प्रविष्ट हो गये । विद्यालय में सरदार पटेल पढ़ाई - लिखाई में बहुत तेज नहीं थे । मैट्रिक में वह बिल्कुल साधारण छात्रा की तरह ही पास हुए । इससे आगे की शिक्षा दिला पाना उनके पिता के वश से बाहर था । इसलिए मादक पास कर लेने के बाद वल्लभभाई को अपने पाँवों पर खड़ा होने के लिए गोधरा में मुख्तारी का काम शुरु कर देना पड़ा । वह बैरिस्टर बनना चाहते थे ।

किन्तु जब तक परिस्थितियों अनुकूल न हो . तब तक में दोनों में ठाट - बाट वेशभूषा त राजनीति लिए उन्हें अपनी यह इच्छा मन में ही दबा लेनी पड़ी । देखा यह गया है कि यदि मनुष्य के मन में कोई तीव्र इच्छा उत्पन्न हो , और वह उस पूरा के लिए कटिबद्ध हो जाए तो पहले पहल असंभव जान पड़ने वाली इच्छा भी पूर्ण होकर हा उसकी पूर्ति के साधन अपने आप न जाने कहाँ से जुटते चले आते हैं । कुछादन गाण के बाद वल्लभभाई बोरसद चले आये और वहाँ फौजदारी मकदमों में वकालत करने लगा । न कहा से जुटते चले आते हैं । कुछ दिन गोधरा में मुख्तारी करत भले ही वल्लभभाई की बुद्धि पढ़ाई - लिखाई में न चमकी , किन्तु वकालत में उन्हें बहुत सफलत दोनों भाइ घर काय में सुधारों ष्ण भी पूर्ण होकर ही रहती है । गलत करने लगे । विद्यालय में उन्हें बहुत सफलता प्राप्त हुई ।



शीघ ही उन्होंने काफी पैसा इकट्ठा कर लिय र था , जो भारत वल्लभभाई का वि में ही स्वर्गवास हो गया । उ काफी पैसा इकमा कर लिया . इतना कि उससे वह सरलता से विलायत जा सकते थे । माई का विवाह 18 वर्ष की आय में ही हो गया था । 1898 ई0 में उनकी पत्नी का असमय हो गया । उन दिनों प्लेग फैली थी । प्लेग से बचाने के लिए वल्लभभाई ने उन्हें गाँव में " तु उन्हें प्लेग हो ही गई । काफी इलाज कराने पर उन्हें बचाया न जा सका । । उनके संकल्प भेज दिया , किन्त उन्हें प्लेग हो ही गई । काप र ही रहता था ।

अद्भुत सहिष्णुता 

                 पत्नी की बीमारी की चिंता हात करने जाते ही रहे । मुवक्किलों को उन्हान दे सरदार पटेल मुकदमें की पैरवी कर रहे थे , उसी समय उन्हें एक ता ही समय बाद संवाद था । उस तार को पढ़कर उन्होंने द प्राप्त की गई विकट समय में उन्हें ' लौहपुरुष बनाया था । बीमारी की चिंता होते हुए भी वल्लभभाई पहले से स्वीकार किये हुए मुकदमों की पैरवी है । मुवक्किलों को उन्होंने भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ा । एक दिन जब वह अदालत में एक परवी कर रहे थे , उसी समय उन्हें एक तार मिला , जिसमें उनकी पत्नी की मृत्यु का दुःखद उस तार को पढ़कर उन्होंने जेब में रख लिया और पहले की भांति ही मुकद्दमें की बहस करते रहा जब शाम को अदालत बन्द हई , उस समय उन्होंने अपने मित्रों को बताया कि नाक स्वर्गवास का दुःखद समाचार थाविपत्तियों को इसी प्रकार चुपचाप सह लेने की क्षमता नहा क्टूबर , 1875 ई . उस समय वल्लभभाई की आय केवल 33 वर्ष थी । उनकी पत्नी दो संतानें एक पुत्र और एक दयालु स्वभाव पुत्री छोड़कर मरी थी ।

  वल्लभभाई ने दूसरा विवाह नहीं किया । के साथ हो गये इस समय वल्लभभाई के पास पैसा था । उन्होंने विलायत जाने के लिए एक कम्पनी से भाग कर दूसरे पत्र - व्यवहार करना शुरू किया । कम्पनी का एक पत्र उनके बड़े भाई विठ्ठलभाई पटेल के हाथ पड़ गया । क गाँव के लोग उन्होंने वल्लभभाई से अनुरोध किया - " पहले मझे इंग्लैण्ड हो आने दो । तुम मेरे बाद चले जाना । " अपने हृदय की तीव्र इच्छा को दबाकर वल्लभभाई ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया ।
               विठ्ठलभाई इंग्लैण्ड चले गये और यथासमय वैरिस्टर बनकर लौट आये । उसके बाद वल्लभभाई इंग्लैण्ड गये । वह केवल बैरिस्टर बनने के उद्देश्य से इंग्लैण्ड गये थे . ही थी । इसके इसलिए माँ बाप का पैसा फूंकने वाले अन्य भारतीय छात्रों की भाँति वह इधर - उधर घूमते नहीं फिरे । बढ़ते थे , तब भी | पढ़ने में उन्होंने ऐसा परिश्रम किया कि वह परीक्षा में सर्वप्रथम रहे । उन्हें पचास पौड की छात्रवृत्ति मिली करते रहते थे । और पिछला सारा शुल्क माफ हो गया । बैरिस्टरी पास करते ही आप सीधे भारत लौट आये । , गया । अन्याय विठ्ठलभाई ने बम्बई में वकालत प्रारम्भ की थी और वल्लभभाई ने अहमदाबाद में । कुछ ही दिनों में दोनों भाइयों का नाम वकालत के क्षेत्र में चमक उठा । आय अच्छी हो जाने के कारण दोनों भाई प्रविष्ट हो गये । टाट - बाट से रहने लगे । उन दिनों वल्लभभाई पश्चिमी रहन - सहन को पसन्द करते थे और भारतीय साधारण छात्रों वेशभूषा तथा रहन - सहन की खिल्ली उड़ाया करते थे ।

राजनीति में प्रवेश -


    काफी धन कमा लेने के बाद विठ्ठलभाई का विचार राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने का हुआ । दोनों भाइयों में तय हुआ कि बड़े भाई तो राजनीति में भाग लेना शुरू करें और छोटे भाई धनोपर्जन करके - उसे पूरा करने घर का खर्च चलाते रहें । विठ्ठलभाई कुछ ही समय में राजनीति के क्षेत्र में भी प्रसिद्ध हो गये और 1919 र ही रहती है । म सुधारों के अनुसार जब केन्द्रीय असेम्बली के चुनाव हुए तो उनमें चुने जाकर आप असेम्बली के सबसे में मुख्तारी करने प्रथम अध्यक्ष बने थे । इस अध्यक्ष पद का कार्य आपने इतनी योग्यता से किया था कि उसकी प्रशंसा गे । विद्यालय में विदेशी कमी | विदेशी दर्शकों ने भी की थी । लता प्राप्त हुई । उन्हीं दिनों गाँधीजी ने अफ्रीका से लौटकर भारत की राजनीति में प्रवेश किया था ।

पहले पहल  वल्लभभाई को गांधीजी का असहयोग और सत्याग्रह की नीति निकम्मा मालूम पड़ती थी । परन्त । सम्पर्क में आने के बाद वह गाँधीजी के पक्के भक्त बन गये । 1916 ई . में तो वह बैरिस्टरी को लात पूरी तरह स्वाधीनता संग्राम में कद पड़े । उनका और गांधीजी का यह साथ जीवनभर बना रहा । पहले पहल गोधरा में एक राजनैतिक सम्मेलन में बेगार प्रथा का हटाने के सम्बन्ध में सम्मेलन में गांधीजी और पटेल का साथ हुआ था । बेगार प्रथा को हटाने के लिए एक समिति बनाई , थी । उस कमेटी के मंत्री वल्लभभाई चुने गये थे । पटेल ने कुछ दिनों में बेगार प्रथा को समाप्त करता दिया ।

1918 में खेड़ा जिले में फसलें खराब हो गयी थी । इसलिए वहां के किसानों ने सरकार से लगा । माफ कराने की प्रार्थना की थी । किन्तु सरकार ने इस उचित प्रार्थना पर भी बिल्कुल ध्यान नहीं दिया । वल्लभभाई ने किसानों के कष्ट को समझा और उन्हें सत्याग्रह करने की सलाह दी । अन्त में सरकार को किसानों की मौंग स्वीकार करनी ही पड़ी । प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात अंग्रेजों ने भारत में जो दमनचक्र चलाया था , उसका विरोध करने । के लिए महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया था । वल्लभभाई भी गुजरात में असहयोग सरद के काम में जुट गये । उन्होंने अपने बच्चों को भी स्कूल से निकाल लिया , क्योंकि सरकारी स्कूलों का बहिष्कार करना भी असहयोग का एक अंग था । उन्होंने गुजरात विद्यापीठ ' की स्थापना की और उसके लिए दस लाख रुपया एकत्र किया ।

 1922 ई0 में चौरीचौरा काण्ड के कारण गाँधीजी ने सत्याग्रह आन्दोलन को स्थगित कर दिया गाँधी - इर्विन । था । सरकार ने गाँधीजी को पकड़कर छ : साल के लिए जेल भेज दिया । उनकी अनुपस्थिति में गुजरात प्रारम्भ कर वि में पटेल ही राजनीतिक आन्दोलन का संचालन करते रहे । बोरसद के सत्याग्रह और नागपुर के झंडा - कर लिए गये सत्याग्रह में उन्हें पूरी सफलता प्राप्त हुई । 1924 में आप अहमदाबाद नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गये । पार्लियामेन्टरी इस पद पर रहकर आप चार साल तक नगर का सुप्रबन्ध करते रहे । पर ।

 सफल सत्याग्रह


           सरदार पटेल सात प्रांतों में बारडोली का सत्याग्रह वल्लभभाई की ऐसी सफलता थी , जिसने उन्हें अखिल भारतीय नेताओं में ला खड़ा किया । इस सत्याग्रह में सफलता मिलने के कारण ही वह ' सरदार ' कहलाने लगे थे । इस सुधार किये । आन्दोलन का कारण यह था कि बारडोली में हर बीस साल बाद भूमि का नया बन्दोबस्त हुआ करता था । भारत के 1928 ई . में जब बन्दोबस्त हुआ तो किसानों के लगान में बीस प्रतिशत वृद्धि कर दी गई । किसानों ने इस बात का विरोध किया । पहले ही भूमिकर इतना अधिक था कि किसान उसे दे पाने में असमर्थ थे । 93 यह बढ़ा हुआ भूमिकर तो उनके लिए दे पाना बहुत ही कठिन था । नेताओं के स किसानों ने वल्लभभाई के सामने अपनी कष्ट - कथा कही । उन्होंने कहा - " हम सत्याग्रह करेंगे और बढ़ा हुआ लगान किसी तरह नहीं देंगे । वल्लभभाई ने इस सत्याग्रह में आने वाली विपत्तियों का मुस्लिम लीग चित्र उनके सामने अच्छी तरह खींच दिया । उन्होंने कहा - " सरकार तम्हें कुचलने के लिए अपनी सारा । ताकत लगा देगी । तुम्हारे घर का सब सामान सिपाही उठा ले जायेंगे । स्त्रियों और बच्चों को भूखों मरना । पड़ेगा । अगर तुम इन सबके लिए तैयार हो तो सत्याग्रह से सफलता मिल सकती है । " जब किसाना न कहा , वे ये सब कष्ट सहने को तैयार है , तो पटेल ने इस सत्याग्रह का नेतत्व अपने हाथ में ले लिया । । इस सत्याग्रह का संगठन पटेल ने इतनी कुशलता से किया कि सरकार को कछ ही समय में घुटने टक । देने पड़े ।


इस आन्दोलन में गुजरात से बाहर के कांग्रेसियों ने सहायता देनी चाही । पर सरदार पटेल अपने म में किसी भी दूसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप पसन्द नहीं करते थे , उन्होंने साफ कह दिया कि बाहरी महायता की कोई आवश्यकता नहीं है । एक बार वल्लभभाई ने अपनी ओर संकेत करते हुए कहा था " बारडोली में केवल एक ही सरदार है , उसकी आज्ञा का पालन सब लोग करते हैं । ' बात सच थी , फिर भी कहीं मजाक में कही गयी थी । तब से ही वह ' सरदार ' कहलाने लगे ।

 सन 1930 ई0 में गाँधीजी ने दूसरी बार सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ दिया । नमक कानून तोड़ने के । लिए गाँधीजी ने ' दांडी यात्रा की और उसके बाद देश में सभी जगह नमक कानून तोड़ा जाने लगा । मोतीलाल नेहरू सत्याग्रह संग्राम के संचालक बनाए गये थे । मोतीलाल जी की गिरफ्तारी के बाद यह भार सरदार पटेल के कन्धों पर डाला गया । पहली अगस्त को लोकमान्य तिलक के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में बम्बई में एक विशाल जुलूस निकाला गया । इस संबंध में सरकार ने सरदार पटेल को गिरफ्तार कर लिया । उन्हें तीन मास की सजा हुई ।

 कांग्रेस के अध्यक्ष 


         सरदार पटेल की सेवाओं का सम्मान करते हुए सन् 1931 ई . में हुए कांग्रेस के अधिवेशन का अध्यक्ष आपको ही बनाया गया । उससे अगले वर्ष भी वही कांग्रेस के अध्यक्ष रहे । सरकार ने गाँधी जी के सत्याग्रह से घबराकर संधि चर्चा की थी और उसके फलस्वरूप गाँधी - इर्विन समझौता हुआ था । परन्तु गोलमेज कॉन्फ्रेंस की असफलता के बाद सरकार ने फिर दमन प्रारम्भ कर दिया । गाँधीजी तथा अन्य प्रमुख नेता जेलों में डाल दिये गये । सरदार पटेल भी गिरफ्तार कर लिए गये । सन् 1934 ई . के अन्त तक वह जेल में ही रहे । जेल से छूटने के बाद उन्हें कांग्रेस पार्लियामेन्टरी बोर्ड का प्रधान बना दिया गया । सन् 1937 ई . में नये विधान के अनुसार सभी प्रान्तों के चुनावों में कांग्रेस की सफलता के लिए सरदार पटेल ने बहुत कार्य किया । सारे देश में दौरा करके उन्होंने जगह - जगह भाषण दिये । कांग्रेस की सात पांतों में भारी बहमत से विजय हुई । इन प्रान्तों में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल बनें और उन्होंने शासन में अनेक सधार किये । पर सन 1939 ई . में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने पर ये मंत्रिमण्डल समाप्त हो गये । ।

 भारत के गृहमंत्री 


9 - MAY अगस्त 1942 को बम्बई में ' भारत छोड़ो ' प्रस्ताव पास किया गया था । उसी रात अन्य प्रमुख पटेल भी गिरफ्तार कर लिये गये थे । 15 जून , 1945 तक ये सब नेता जेल में ही रहे । बाद सरकार ने समझौता करने के लिए सब नेताओं को छोड दिया । कई महीनों तक कांग्रेस , और अंग्रेजी सरकार में समझौते की चर्चा चलती रही । अन्त में 2 सितम्बर , 1946 को पहली बार केन्द्र में जा जनता की लोकप्रिय सरकार बनी . जिसके प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू थे । उस अन्तरिम सरकार में सरदार पटेल गृह तथा सूचना विभाग के मंत्री बने । बाद देश का विभाजन हो गया । 15 अगस्त , 1947 को देश पूर्णतया स्वाधीन हो गया । राष्टीय सरकार में पहले की भांति गृह तथा सूचना विभाग के मंत्री रहे । साथ ही उन्हें । का पद और मिला । देश के विभाजन के समय जो उपद्रव हुए थे , उनमें सरदार पटेल ने दता से काम लिया । इसके फलस्वरूप उपद्रवों की भयंकरता बहत कम हो गई । अंग्रेजों म लीग की बहुत सी चालें विफल हो गई । 87 सरदार पटेल नई राष्ट्रीय सरकार में पहले की उपप्रधान मंत्री का पद और मिला । अत्यन्त धैर्य और दृढ़ता से काम लिया ।


 देशी राज्यों का विलय



      अंग्रेजों ने जब भारत को स्वाधीन किया तो उन्होंने देशी राज्यों के साथ हुए अपने सब और सन्धियाँ समाप्त कर दीं । ये राज्य अब अपने भविष्य का निर्णय करने में स्वतंत्र थे । जो है अंग्रेजों के समय उनके पित बनकर रहने को तैयार थे , वे अब पूर्ण प्रभुसत्तासम्पन्न राज्य बनने । अतिलघूत्तर देखने लगे । केवल भारत में ही इन राज्यों की संख्या 600 के लगभग थी । यदि सचमुच ही ये राज्य पर उतर आते तो भारत सरकार के लिए अच्छी मुसीबत बन जाते । परन्तु सरदार पटेल ने उस सम वल्ल 12 . कुशलता , दूरदर्शिता और दृढ़ता से काम लिया । इनमें से अनेक छोटे - छोटे राज्यों को तो उन्होंने आ वल्ल के बड़े राज्यों में मिला दिया और बहुत से बड़े - बड़े राज्यों को मिलाकर उनमें ख श्रेणी के राज्य 3 . सरद दिये । ये ' ख ' श्रेणी के राज्य भी भारतीय संघ के अंग बन गये । इन राज्यों के राजप्रमुख पुराने राज अजेय नवाब ही बना दिये गये । हैदराबाद में रजाकारों ने बहुत उत्पात मचाया हुआ था । वहां सरदार पटेल सेना भेजकर शांति स्थापित करवा दी और हैदराबाद भी भारतीय संघ में सम्मिलित हो गया ।
यह पटेल के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था , जिसके लिए भारत उनका सदा ऋणी रहेगा 1 सरदा जब तक पटेल जीवित रहे , तब तक भारत सरकार सब विषम समस्याओं का बड़ी निश्चिन्तता के साथ 22 . वल्ल सामना करती रही । 3 . _ _ कार्य के आधिक्य के कारण सरदार पटेल का स्वास्थ्य खराब रहने लगा । पर्याप्त विश्राम न मिल । निबंधात्मक पाने के कारण चिकित्सा विशेष उपयोगी सिद्ध नहीं हुई । आखिर 15 दिसम्बर 1950 ई0 को उनका स्वर्गवास हो गया ।

 सरदार पटेल शक्ति के पुंज थे । किन्तु उनकी शक्ति तब तक प्रकट नहीं होती थी , जब तक 2 . बाधाएं सामने आकर उन्हें चुनौती नहीं देती थीं । किन्तु बाधा या विपत्ति सामने आने पर वह चट्टान की भांति कठोर और अजेय हो जाते थे । मौलाना शौकतअली ने उन्हें एक बार ' बर्फ से ढका हुआ ज्वालामुखी कहा था । उनके लिए इससे अच्छी दूसरी उपमा ढूंढ पाना कठिन है ।


शब्दार्थ 



  •  वज्र  = कठोर / जिस पर प्रभाव न पड़ सके , इन्द्र के वज़ समान , 
  • मुख्तारी = मुकद्मे लड़ने का काम या पेशा ,
  •  संक्रांति = संक्रमण काल , 
  • मुवक्किल = वकील का आसमी , 
  • कॉन्फ्रेन्स = सम्मेलन , 
  • खिल्ली उड़ाना = मजाक बनाना ,
  •  बन्दोबस्त = व्यवस्था , 
  • हस्तक्षेप = अनावश्यक दखल 

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