फिर से सोचने की आवश्यकता है -Ncert full lesson


Wednesday, 9 October 2019



फिर से सोचने की आवश्यकता है -Ncert full lesson 


 



                     राप्रसाद द्विवेदी हजार - हजार अनुभव हो रही बैठा - हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रश्न है ? पहला मत परिणाम तक और अनुपयोगि नाम है । ऐसे उतावली नायि लेखक - परिचय प्रसिद्ध निबंधकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1907 में बलिया जिले के " दुबे का ।

              छपरा ' नामक गाँव में हुआ एवं मृत्यु 1979 में हुई । आचार्य द्विवेदी ने काशी विश्वविद्यालय में अध्ययन । साप " " " " के बाद शान्ति निकेतन में लगभग बीस वर्ष तक कार्य किया । यहाँ रहते हुए उन पर रवीन्द्र नाथ टैगोर के मानवतावादी दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा । उन्होंने अलोचना और निबंध विधा को समद किया । उनके मान दारा लिखे गये चारों उपन्यास ( बाणभट्ट की आत्मकथा . पुनर्नवा , अनामदास का पोथा , चार चन्द्रलेख ) अत्यंत श्रेष्ठ एवं चर्चित हैं । उनके द्वारा लिखित प्रमुख पुस्तकें हैं - हिन्दी साहित्य की भूमिका , कबीर , सर साहित्य , अशोक के फूल , कल्पना , विचार और वितर्क . हिन्दी साहित्य का आदिकाल आदि । उनके ये मान निबंध मानव मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं ।



 पाठ - परिचय 



                     आचार्य द्विवेदी ने प्रस्तुत निबंध में स्वतंत्र देश में राष्ट्रभाषा के प्रति जो भाव हैं उस पर चिन्ता प्रकट की है । अधिकतर लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा को भुलाकर अंग्रेजी की गुलामी ऐसे करना वे अनुचित मानते हैं और देशवासियों को इस विषय पर फिर से सोचने के लिए प्रेरित करते हैं । प्रयोजनों के पी आज विशेषकर युवा पीढ़ी की उपेक्षा झेल रही है - हमारी भाषा ।


  * * * 


                आजकल मेरे मन में एक बड़ा सवाल उठा हुआ है । बहुत पहले मैं इसका जवाब पा चुका था , धर्म है सन्तुष्ट भी था , लेकिन हाल में देश में अनेक ज्ञानी - गुणी लोगों के सम्पर्क में आने के बाद चित्त विचलित हो उठा । मैंने जो उत्तर पाया था , वह क्या सही था ? यद्यपि भीतर से आवाज आती है कि उत्तर तुमने जल पाया था वही सही है और जो विचिकित्सा इस समय खड़ी है वह गलत है , तो भी मेरे चित्त में आज जल नये सिरे से उस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए प्रयत्न शुरू हो गया है । सत्संगति की महिमा कम - से - कम समझदार कह इस देश में अज्ञात नहीं रह गई है और मैं तो व्याकुलता के साथ अनुभव कर रहा हूँ कि सत्संगति ने मेर अन्तरतम को आलोडित कर रखा है । भीतर की आवाज केवल आदत का नतीजा है । इस खास ढंग से जो सोचते रहने वाला आदमी उसी ढंग की आवाज सुना करता है । जिन लोगों की वाणी पर विश्वास करक । राज्य - व्यवस्थ आज तक चलता रहा हूँ , वे ऐसा नहीं मानते । रवीन्द्रनाथ ने कहा कि त लोगों की बात पर कान न है । अंग्रेजी को व हजार - हजार आकर्षण से खिंचा - खिंचा भटकता न फिर ऐसा हो कि तेरा हदय जाने कि तेरे हृदय में घो - पोंछ कर को विदेशी
गरी प्रसाद दिल - जिले के " दुरेश विद्यालय में अध्ययन ही तेरा राजा बैठा है

लोकेर कथा दिस ने काने ,
 फिरिस ने आज हजार टाने . 
येन रे होर हृदय जाने . हदय तोर आधेन राजा । 

                        पता होगा लेकिन आज दनिया की बातों को अनसुनी करने की शक्ति नहीं रह गई है । आकर्षण बुरी तरह खींच रहे हैं और हृदय - देश में स्थित राजा की आज्ञा के पालन में झिझक अनुभव हो रही है ।

          प्रश्न यह है कि काम निकाल लेना बुद्धिमानी है , या मान के लिए मर मिटना मनुष्यत्य की निशानी ह पहला मत उन लोगों का है जो समझदार माने जाते है , जो भावुक नहीं होते . जिनकी दृष्टि सीधे परिणाम तक पहुँची होती है । वे हाथ पर रखे हुए आँवले के फल के समान प्रत्येक वस्तु की उपयोगिता और अनुपयोगिता को स्पष्ट देख लेते है । उनकी दृष्टि में काम बड़ी चीज है . मान केवल भावुकता का आया नाम है । ऐसे समझदार लोग काम को बड़ा मानते है , मान उनकी दृष्टि में नगण्य है । पुराने काव्य की मनाथ हा उतावली नायिका के समान वे कहते हैं कि

       मान घटे तें कहा घटि है . 
जो पै प्रान पियारे के दर्शन पैये ।

         दूसरे मत में मानने वाले लोग सचमुच भावुक होते हैं । उनकी दृष्टि में मान का बड़ा महत्त्व है । वे मान के साथ दिए गए विष को पी लेते हैं और गर्वपूर्वक घोषणा करते हैं कि

मान सहित विष खाइके शंभु भये जगदीश ।
 बिना मान अमृत पिए राहु कटायो सीस । । 

             ऐसे लोगों ने अनेक प्रकार के तत्त्व - दर्शन बना रखे है । केवल जीवन - धारण के लिए उपयोगी ए प्रेरित करते । प्रयोजनों के पीछे दौड़ना पशु का धर्म है । मनुष्य प्रयोजन के पीछे दौड़ने के लिए नहीं बना है . प्रयोजनों से जो अतीत धर्म है , वही मनुष्यत्व है । शक्ति , प्रेम , दया , सहानुभूति आदि गुण , स्थूल प्रयोजनों की सिद्धि करें तो , और न करें , तो बड़े हैं और पालनीय हैं । आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य को इन वास्तविक धर्मों की रक्षा के लिए अपने - आप को बलि चढ़ा देना चाहिए । मनुष्य इसलिए मनुष्य है कि उसमें मनुष्यत्व समृद्ध किया । उस था , चारु चन्द्रलेय भूमिका . कबीर चल आदि ।


जलदानेन हि जलदः - न हि जलदो पुजिता धूमः । 
जलद वह है जो जल दे सके , पूंजित धूम को जलद नहीं कह सकते । 


पहली श्रेणी के लोग समझदार कहे जाते हैं . दूसरी श्रेणी के भावुक ।


             जो लोग समझदार हैं , उनकी बात सुनकर मन अचरज से अवाक ही रहता है कि इस देश की राज्य - व्यवस्था यदि ठीक चलती है . दस पढ़े - लिखे आदमियों को अगर ठीक से अन्न मिल जाता है , तो अग्रेजी को क्यों छोड़ा जाए ? आखिर डेढ सौ वर्षों तक हम लोग अंग्रेजी के दावेदार रहे है । इतिहास को धी - पोछ कर फेंक नहीं दिया जा सकता । सिर्फ इसलिए कि वह हमारे पुराने शासकों की भाषा थी , अंग्रेजी का विदेशी नहीं कहा जा सकता है । क्या यह तथ्य नहीं है कि इस देश के बीसियों बाप - बेटो का कि तेरे हदय
पला आसानी सो वर्षों स्तुतः हमारी राम गलत बात । है । उनकी पूजा जा रहा है . ऐसा के आक्रमण सेव होने जा रहा है ? था . या कहीं हो लोग अनुभवी है । छोड़ा भी नहीं ज लोग है जो उसी पत्र - व्यवहार अंग्रेजी में होता है ? बहुत से ऐसे बाप - बेटों और पति - पत्नियों की नामावली आसानी स्तुत गिना दी जा सकती है । क्या हमारे नेता - गण अपना काम इसी भाषा में नहीं चाहते थे ? डेढ़ सौ व गल निरन्तर अभ्यास के कारण समूचे देश में यह भाषा प्रतिष्ठित हुई है . क्यों इसका निरादर किया जाय । उन गा भारतवर्ष का परम सौभाग्य नहीं है कि उसकी आधी फीसदी जनता इस संसारकी सर्वमेय र हा से परिचित है ? इस महिमामयी भाषा की तुलना में देशी भाषाओं में क्या धरा है ? सिर गिनने से देश नाम नहीं चलता . दिमाग गिनना है ।


तुम कहते हो , देश की जनता सौ कीसदी देशी - भाषा जानती यह केवल सिर गिनना मात्र है । गिनती दिमाग की होनी चाहिए । देश की आधी फीसदी की भी आ फीसदी दफ्तर की फाइलों पर नोट लिखने की कला में प्रवीण है और उस आधी फीसदी की आधी पीसी देश - विदेश में लाज - हया छोड़कर अंग्रेजी बोल लेने की कला में पूर्ण दक्ष सिद्ध हो चुकी है , तो क्या का लेकिन दिमाग की गणना होनी चाहिए ! अंग्रेजी अब इस देश में विदेशी भाषा नहीं है । वह भी हमारी राष्ट्रीय मामा है । अभी भी अंग्रेजों के बहुत से बच्चे इस भाषा को बोलते हैं । और देशी भाषाओं में रखा ही क्या है !



                तुलसीदास की रामायण से या तुकाराम के अभंगों से हाकी रट लगान का शासन नहीं चल सकता । भारतवर्ष में एक भी भाषा ऐसी नहीं है , जिसमें कोई समझदार न्यायाधीश कछ जैसा है . उ फैसला लिख सके । वह फाँसी की सजा दे सकता है . लेकिन दण्डित व्यक्ति को उसी की भाषा में समय से सिर छिपा लेन नहीं सकता कि क्यों उसे फाँसी दी गई । यदि वह पूछे कि दयानिधान , मुझे यह तो बता दीजिए कि मो । है कि उसने सृणि फाँसी क्यों दी गई , तो उत्तर यह है कि तुम मूर्ख लोगों की भाषा में इतनी शक्ति नहीं कि हमारे निर्णय की अक्लमन्दी को व्यक्त कर सकें । यदि जानना ही चाहते हो तो हमारी ही जैसी अंग्रेजी जानने वाले किसी वकील को बनाने का प्रयत्न हजार - पाँच सौ रूपया देकर ठीक कर लो , जो समझा सके कि क्यों तुम्हें फाँसी दी गई । तुम्हें सिर्फ फोर्स बड़ी नहीं हो जा पर झूल जाने का अधिकार है ।

क्यों और कैसे का निर्णय बड़े लोगों के बीच की बात है । देशी भाषाको धारण करके प्रक में फैसला नहीं लिखा जा सकता । जनता का शासन केवल बात की बात है । जनता की भाषा का नारा । करते । भावावेग . केवल वोट प्राप्त करने वालों के लटकों में से एक है । शासन की मशीन नारों पर नहीं चलती , फाइलें । तर्जनी - संकेत पर नोट लिखने की विद्या बड़ी मेहनत से सीखी जा सकती है । जनता की सुविधा की थोथी दलील पर का नामान्तर मा परिवर्तन नहीं किया जा सकता । कदामि ऊपर के वाक्यों को पढ़ने वाले व्यक्ति के मन में प्रतिक्रिया हो सकती है कि मैं व्यंग्य और विनोद बनाने का यत्न की भाषा लिख रहा हूँ , परन्तु मैं सच्चाई के साथ कहता हूँ कि मैंने बुद्धिमान लोगों से जो बाते सुनी है ।

             अक्षमताओं को उनका यही अर्थ हो सकता है । मैंने पंडितों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के प्रति आजीवन श्रद्धा का भाव बनार । कुछ थोड़े - से रखा है , मैंने ऐसे लोगों की प्रत्येक बात को आदर और श्रद्धा से सुनने का नियम बनाया है और इसीलिए । से देश महान आज मेरा चित्त बहुत चंचल है मैं व्याकुल भाव से सोचत हूँ कि आज से दस वर्ष पहले तक जिन दीवाने ने सर पर कफन बाँधकर देश की कोटि - कोटि जनता को शोषण और परमुखापेक्षिता से बचाने के लिए शब्दार्थ अचिन्तनीय यातनाएँ सही थी , उन्होंने क्या यही स्वप्न देखा था ? आज खुल्लमखुल्ला कहा जाने लगा कि विचिकि स्वतन्त्रता - प्राप्ति के नवीन आवेश में संविधान बनाने वाले देशभक्तों ने देश की भाषा - सम्बन्धी नीति के तत्त्वदर्शी गलत ढंग से स्वीकार किया । अब नशा उतर गया है । पद - पद पर गोलियों के सामने सीना तान देने वाले निष्क्रिया दीवानों की संख्या घट गई है । इनको मूर्ख तो क्या कहा जाए . पर काम उन्होंने बुद्धिमानी का नहीं किया । परमुखा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब बुद्धिमान लोग अपनी तरक्की का स्वप्न देखा करते थे , उस समय प्रह मुँह देख लेकर चिल्ला - चिल्लाकर अपनी सांस्कृतिक स्वतन्त्रता की घोषणा करने वाले ' अनपढ़ नौजवानों का जमाना लद चुका है . अब हमें धैर्य और विवेक के साथ विचार करना चाहिए । डेढ़ सौ वर्षों तक अनेक वस्तुनिष्ठ प्र अपमान और तिरस्कार की छाया में सीखी हुई मालिकों की बोली को यों ही नहीं भुला देना चाहिए ।




             मावली आसानी थे ? डेढ़ सौ वर्षों दर किया जाय ? की सर्वश्रेष्ठ भार - गिनने से देश का - भाषा जानती । सदी की भी आ 1 की आधी फीसद है . तो क्या हु हमारी राष्ट्रीय भाग के अभंगों से देश नझदार न्यायाधीश की भाषा में समझा । वस्तुतः हमारी राष्ट्रीय जबान हो गई हैं आज जो विदेशों में हमारी पाक है , वह इसी बोली के कारण है । यह गलत बात है कि गाँधी और नेहरू ने कोई बड़ी बात कही है . इसलिए दुनिया उनकी पूजा करता है । उनकी पूजा का प्रधान कारण अंग्रेजी बोली है । देखो देश में इस बोली की पढ़ाई का स्तर जा रहा है . ऐसा न हो कि गाढे पसीने की यह कमाई यही नष्ट हो जाए । इसे बचाओ , दरिद्र देशी भाषाओं के आक्रमण से कहीं यह मार न डाली जाए । सनता है और सोचता हूँ कि सचमुच ही क्या कोई अनथ होने जा रहा है ?

           सचमुच ही जिन लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी , उनमें पागलपन ही पागलपन था , या कही होश - हवाश भी था ? इतने बुद्धिमान लोगों की बात क्या यों ही टाल दी जाए ? आखिर ये लोग अनुभवी हा बिना सोचे - समझे कुछ नहीं कहते । इनकी बातों में कुछ - न - कुछ सार ती अवश्य होगा । लकिन फिर म सोचता हूँ कि प्राण देने का साहस जिन्होंने किया था उनको इतनी आसानी स छोड़ा भी नहीं जा सकता । कितने लोग हैं जो किसी आदर्श के लिए कष्ट सहन कर सकते हैं ? कितने लोग है जो उसी प्रकार उठकर अनीति और अत्याचार का विरोध कर सकते हैं ? जिस प्रकार स्वतन्त्रता की रट लगाने वाले भावावेशी नौजवानों ने किया था ? 

मनुष्य क्या केवल इसलिए पैदा हुआ है कि जो कुछ जैसा है , उसे चुपचाप स्वीकार कर ले ? मेरा अन्तरतम ऐसा नहीं मानना चाहता । केवल अक्लमन्दी से सिर छिपा लेना ही बड़ी बात होती . तो मनुष्य कीड़े - मकोडों से अधिक न होता । मनुष्य इसलिए ' मनुष्य ' । दीजिए कि मुझे है कि उसने सृष्टि की धारा को अपने पुरुषार्थ से अनुकूल दिशा में मोड़ा है । कई बार उस पर गलत ढंग कि हमारे निर्णय की अक्लमन्दी का नशा छा जाता है । वह अपनी दुर्बलताओं को तत्त्वचिन्तक मनीषी की भाषा में महनीय किसी वकील को बनाने का प्रयत्न करता है । अपनी आदतों को फलसफे का रूप देता है , परन्तु इससे गलतियों या दुर्बलताएँ । तुम्हें सिर्फ फाँस बड़ी नहीं हो जाती । जो तर्क इस दृष्टि से दिये जाते हैं कि हमारी आदतें और लते चारित्र्य का बाना है । देशी भाशज धारण करके प्रकट हों . वे ताभास मात्र हैं । अन्तर्याम सब समय तकों के द्वारा अपनी योजना नहीं प्रकट की भाषा का नार करते । भावावेग , तर्कों की अपेक्षा अधिक गहराई से निकलते हैं । वे अन्तरतम में बैठे हुए अज्ञात देवता के चलती , फाइट तर्जनी - संकेत पर चलते हैं । तथाकथित अक्लमन्दी और कई बार निष्क्रियता लत और आदत के इंगित थोथी दलील पर का नामान्तर मात्र होती है ।

कदाचित आज यह सोचने की आवश्यकता आ पड़ी है कि हम अपनी दुर्बलताओं को महनीय यंग्य और विनोद बनाने का यत्न तो नहीं कर रहे हैं , अपनी निष्क्रियता को तत्त्ववाद का रूप तो नहीं दे रहे हैं , अपनी अक्षमताओं को गौरव देने के लिए तर्काभासों का सहारा तो नहीं ले रहे हैं ? क्या करोड़ों की उपेक्षा करके कुछ थोड़े - से - लोगों की सुविधा को बहुत बड़ा लाभ माना जा सकता है ? या सचमुच स्वभाषा की उपेक्षा से देश महान् बनेगा ? हमें फिर से सोचना पड़ेगा ।


शब्दार्थ 



  • विचिकित्सा - संदेह ,
  •  आलोड़ित - मंथन किया हुआ ,
  •  नामान्तर - दूसरा नाम .
  •  तत्त्वदर्शन - सार , 
  • पुंजित - एकत्रित . 
  • अभंग - पद , 
  • निष्क्रियता - काम न करना
  •  तत्त्वचिन्तक - दार्शनिक ,
  •  तर्काभास - तर्क का आभास मात्र
  •  , परमुखापेक्षिता - दुसरे का 
  • अचिन्तनीय - जिसका 
  • चिंतनइंगित - इशारा ,
  •  मुँह देखना , या बोध न हो सके . 

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