हार की जीत NCERT 11 सारांश


Sunday, 20 October 2019


हार की जीत NCERT 11 सारांश 


                                                                                                                - सुदर्शन लेखक 


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 परिचय


 श्री  सुदशन जी का जन्म सन 1855 में सियालकोट में हआ । इनका मूल नाम बद्रीनाथ हा सुदर्शन ने बी . ए . तक शिक्षा प्राप्त की । इन्होंने प्रेमचन्द की भाँति ही सर्वप्रथम उर्दू में लिखा तत्पश्चात उन्होंने हिन्दी में लिखा । सुदर्शन ने कहानियों के अतिरिक्त उपन्यास और नाटक भी लिखे । इनकी कहानियों पुष्पलता , तीर्थयात्रा , सुदर्शन सुधा , सुप्रभात , परिवर्तन , पनघट , नगीना , चार कहानी आदि कहानी संग्रहों में संकलित है । प्रेमपुजारिन , देहाती . देवता और भाग्यवन्ती इनके उपन्यास जिए । हैं । अंजना , सिकन्दर और भाग्यचक्र इनके प्रसिद्ध नाटक हैं । यात्रा वृत्त में आये सुदर्शन ने सामाजिक जीवन के विविध पक्षों को अपनी कहानियों में उकेरा है । सामाजिक जीवन की विसंगतियों को चित्रित करते हुए सुदर्शन आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के हिमायती है । सुदर्शन की वर्णन कीजिए । कहानियों में वर्णनात्मकता की प्रधानता होती है । वे परिस्थिति का अंकन करते हुए उस परिवेश के चक्रव्यूह में फंसे मानव की नियति और उसकी मनःस्थिति को अभिव्यक्त करते चलते हैं । गीय बन गयी है सुदर्शन सरल सहज शब्दावली और अपनी भावमयता में अनूठे हैं । सामाजिक जीवन के सरस एवं व्यावहारिक रूप का अभिव्यंजन इनकी कहानियों की विशेषता है ।


पाठ - परिचय



 हार की जीत कहानी संन्यासी की उदारता , प्रेम और मानवीयता के माध्यम से एक डाक के हदय परिवर्तन की मर्मस्पर्शी कहानी है । घोखे से डाकू खड़ग सिंह असहाय दुःखी अपाहिज बनकर बाबा भारती का प्राणों से प्रिय घोडा छीन लेता है लेकिन बाबा के ये शब्द ' इस घटना को किसी को मत बताना अन्यथा कोई भी गरीब अपाहिज पर विश्वास नहीं करेगा पाषाण हृदयी डाकू के हृदय में संवेदना का निर्झर प्रवाहित कर देते हैं । डाकू खड़ग सिंह न केवल बाबा के घोड़े को लौटाता है बल्कि प्रायश्चित स्वरूप अपनी आँखों के गंगा जल से उस स्थान को पवित्र करता है जहाँ बाबा भारती के अश्रु बिन्दु गिरे थे । यह निजत्व की हानि को मनुष्यता की हानि पर समर्पित कर देने का भाव प्रदर्शित करने वाली आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहानी है ।

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माँ  को अपने बेटे , साहकार को अपने देनदार और किसन को अपने लहलहाते खेत देखकर जो गन्द आता है वही आनन्द बाबा भारती को अपना घोल देखकर आता था । भगवत - भजन से जो समय  बचता , वह घोड़े को अर्पण हो जाता । यह घोड़ा बड़ा सुन्दर था , बड़ा बलवान था । इसके जोड़ का घोड़ा इलाके में न था । बाबा भारती उसे सुलतान कहकर पुकारते , अपने हाथ से खर - हरा करते . खुद दाना ने न समाते थे खिलाते , और देख - देखकर प्रसन्न होते थे ।

 ऐसी लगन , ऐसे प्यार , ऐसे स्नेह से कोई सच्चा प्रेमी अपने सहसा प्यारे को भी न चाहता होगा । उन्होंने अपना सब कुछ छोड़ दिया था - रुपया , माल असबाब , जमीन , यहाँ आवाज तक कि उन्हें नागरिक जीवन से भी घणा थी । अब गाँव के बाहर एक छोटे से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे । परन्तु सुल्तान से बिछड़ने की वेदना उनके लिए असह्य थी । मैं इनके बिना नहीं रह राह सकूँगा , उन्हें ऐसी भ्रांति - सी हो गई थी । वे उसकी चाल पर लटूथे । कहते , ऐसा चलता है जैसे मोर घन घटा को देखकर नाच रहा हो ।

                                    गाँवों के लोग इस प्रेम को देखकर चकित थे , कभी - कभी कनखियों न मालक , मुझ से इशारे भी करते थे , परन्तु बाबा भारती को इसकी परवाह न थी । जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ दस मील का चक्कर न लगा लेते , उन्हें चैन न आता । " दुर्गाद बाबा भा माफ खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था । लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे । होते - होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची । उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा । वह ड़कर धीरे - धी एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुंचा और नमस्कार करके बैठ गया ।

बाबा भारती ने पूछा - खड़गसिंह ! क्या हाल है ?
खड़गसिंह ने सिर झुका कर उत्तर दिया - आपकी दया है ।
 " कहो , इधर कैसे आ गये ?
" सुलतान की चाह खींच लाई ।
" विचित्र जानवर है । देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे । "
 " मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है । "
 " उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी । "
 " कहते हैं , देखने में बड़ा सुन्दर है ।
 " क्या कहना । जो उसे एक बार देख लेता है उसके हृदय पर उसकी छवि अकित हो जाती है । " करा कसाई की " बहुत दिनों से अभिलाषा थी , आज उपस्थित हो सका हूँ ।

                      " बाबा और खड़गसिंह दोनों अस्तबल में पहुँचे । बाबा ने घोड़ा दिखाया , घमंड से । खड़गसिंह ने येगा । । हूँगा , परन्तु खड़ा घोड़ा देखा , आश्चर्य से । उसने सहस्त्रों घोड़े देखे थे , परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न यगा । गुजरा था , सोचने लगा - भाग्य की बात है . ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था , इस साधु को ऐसी चीज से क्या लाभ ! कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा । इसके पश्चात् हृदय में हलचल सपना को होने लगी । बालकों की - सी अधीरता से बोला - परन्तु बाबाजी ! इसकी चाल न देखी तो क्या देखा ? बाबाजी भी मनुष्य ही थे ।

 अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदयभागना पड़े भी अधीर हो गया । घोड़े को खोल कर बाहर लाये , और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे । एकाएक क उचककर सवार हो गये । घोड़ा वायु - वेग से उड़ने लगा । उसकी चाल देखकर उसकी गति देखकर . टा . ससे का खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया । वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाय , उस पर अपना । हा . अधिकार समझता था । उसके पास बाहुबल था , और आदमी थे ! जाते - जाते उसने कहा - बाबाजी ! मैं यह । " पको क्या डर घोड़ा आपके पास न रहने दूंगा । सुनकर वा बाबा भारती डर गये । उन्हें रात को नींद न आती थी । सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने । लगी । प्रतिक्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता । परन्तु कई मास बीत गये , और वह न आया । यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ लापरवाह हो गये । और इस भय को स्वप्न के भय की नॉई मिथ्या समझने लगे । भी कोई सम्बन्ध ' जि रहे थे ।


सोचता 78 " बाबाजी ! खड़गसिंह अस्तबल की रखवाली में करने हन आया । यहाँ तक . पर विश्वास में और यह
ना उनकी आँखों में चमक थी . मुख पने फूले न समाते थे । सध्या का समय था । बाबा भारती सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे । इस समय वा में चमक थी , मुख पर प्रसन्नता ! कभी घोड़े के शरीर को देखते , कभी रंग को और मन में । FTEASE सहसा एक ओर से आवाज़ आयी - ओ बाबा ! इस कॅगले की भी बात सुनते जाना । आवाज में करुणा थी । बाबा ने घोड़े को थाम लिया । देखा , एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा रह कराह रहा है । बोले - क्यों , तुम्हें क्या कष्ट है ? अपाहिज ने हाथ जोड़ कर कहा - बाबा ! मैं दुखिया हूँ , मुझ पर दया करो । रामांवाला यहाँ से पान माल है , मुझे वहाँ जाना है । घोड़े पर चढ़ा लो , परमात्मा भला करेगा । पर " वहाँ तुम्हारा कौन है ? " नाए " दुर्गादत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा । मैं उनका सौतेला भाई हूँ । " बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम वह पकड़कर धीरे - धीरे चलने लगे । सहसा उन्हें एक झटका लगा , और लगाम हाथ से छूट गयी । उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा , जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर बैठा घोड़े को दौड़ाये लिये जा रहा है ।

 उनके मुख से । मय , विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गयी । यह अपाहिज खड़गसिंह डाकू था । बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे , और इसके पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्ला कर बोले - जरा ठहर जाओ ।खड़गसिंह ने यह आवाज सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गर्दन पर प्यार से हाथ फेरते ए कहा - बाबाजी ! यह घोड़ा अब न दूंगा । " परन्तु एक बात सुनते जाओ ।
" खड़गसिंह ठहर गया । बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा , जैसे हा करा कसाई की ओर देखता है , और कहा - घोड़ा तुम्हारा हो चुका , मैं तुमसे वापस करने के लिए न हूंगा . परन्त खडगसिंह केवल एक प्रार्थना करता हूँ , उसे अस्वीकार न करना , नहीं तो मेरा दिल टट ने जायेगा । न " बाबाजी ! आज्ञा दीजिए ।

 मैं आपका दास हूँ , केवल यह घोड़ा न दूंगा । " भाष " अब घोड़े का नाम न लो . मैं तुमसे इसके विषय में कुछ न कहूंगा । मेरी प्रार्थना केवल यह है । चल के इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना । 7 खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया । उसका विचार था कि मुझे इस घोड़े को लेकर का से भागना पड़ेगा , परन्तु बाबा भारती ने स्वयं उससे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट करना । इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है ? खड्गसिंह ने बहुत सोचा , बहुत सिर मारा , परन्तु कुछ बन सका । हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दी , और पूण - बाबाजी ! इसमें वना व्यको क्या डर है ? बाट सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया - लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया तो वे किसी सब पर विश्वास न करेंगे । आर यह कहते - कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया , जैसे उनका उससे सम्बन्ध न था । बाबा भारती चले गये परन्तु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार था सोचता था - कैसे ऊँचे विचार है , कैसे पवित्र भाव हैं ! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था ; इसे देखकर . और यह कहत मी कोई सम्बन्ध न बोल रहे थे ।

सोचता था  उनका मुख फूल की नौई खिल जाता था ; कहते थे , इसके बिना मैं रह न सकूँगा । उसकी रखवाली में वह कई रात सोये नहीं । भजन - भक्ति न कर रखवाली करते रहे परन्तु आज उनके मुख पर दुःख की रेखा तक न दीख पड़ती थी ।
उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग गरी पर विश्वास करना न छोड़ दें । उन्होंने अपनी निज की हानि को मनुष्यत्व की हानि पर न्योछावर कर दिया । ( ग ) य ऐसा मनुष्य , मनुष्य नहीं , देवता है । रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मन्दिर में पहुंचा । चारों ओर सन्नाटा था , आकाश पर तारे टिमटिमा रहे थे । थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंकते थे । मन्दिर के अन्दर कोई शब्द सुनायी ना देता था ।

 खडगसिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था । वह धीरे - धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुंचा । । फाटक किसी वियोगी की आँखों की तरह चौपट खुला था । किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे , परन्तु आज उन्हें किसी चोरी , किसी डाके का भय न था । हानि ने उन्हें हानि की ( घ ) आ तरफ से बेपरवा कर दिया था । खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और 3 . बाबा म बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बन्द कर दिया । इस समय उसकी आँखों में नेकी के आंसू थे । अन्धकार में रात्रि ने तीसरा पहर समाप्त किया और चौथा पहर आरम्भ होते ही बाबा भारती ने । ( ग ) धीर अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया । उसके पश्चात् इस प्रकार , जैसे कोई स्वप्न चल 4 . रहा हो , उनके पोच अस्तबल की ओर मुड़े । परन्तु फाटक पर पहुंचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई । साथ ( क ) ग्रा ही घोर निराशा ने पाँवों को मन - मन भर का भारी बना दिया ।

वे वहीं रुक गये । घोडे ने स्वाभाविक मेधा से अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और जोर से । हिनहिनाया । अतिलघूत्तरात याचा भारती दौडते हुए अन्दर घुसे , और अपने घोड़े से गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे । जैसे बिछड़ा हुआ पिता चिरकाल के पश्चात् पुत्र से मिल कर रोता है । बार - बार उसकी पीठ पर हाथ खड़गनि फेरते . बार - बार उसके मुंह पर थपकियाँ देते और कहते थे - अब कोई गरीबों की सहायता से मुंहन ' विचित्र मोड़ेगा । डाकूर थोड़ी देर बाद जब वे अस्तबल से बाहर निकले तो उनकी आँखों से आँस बह रहे थे वे आस् । 14 . बाबाम उसी भूमि पर , ठीक उसी जगह , गिर रहे थे जहाँ बाहर निकलने के बाद खड़गसिंह खड़ा होकर राया लघूत्तरात्मक था । बहुत दोनों के आँसुओं का उसी भूमि की मिट्टी पर परस्पर मिलाप हो गया ।

 शब्दार्थ 



  • अभिलाषा - इच्छा
  •  खरहरा - घोड़े के बदन की गर्द साफ करने वाली लोहे की कधी । 
  • अस्तबल - घोड़ों को बाँधने का स्थान 
  • बाहुबल - शारीरिक शक्ति 
  • नोई - समान 
  • अपाहिज -  अपंग 
  • दिल टूटना - बहुत दुखी निबंधात्मक ' 
  • हार व साँप लौटना - ईर्ष्या के वशीभूत होना 
  • कीर्ति - यश
  •  कंगले - दरिद्र
  •  लगाम - डोरी
  •  मेधा - बुद्धि । 

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