निराला भाई NCERT 11 पाठ सारांश


Saturday, 19 October 2019



 निराला भाई NCERT 11 पाठ सारांश 



                                                                                                               - महादेवी वर्मा 

 निराला भाई


लेखक - परिचय


कवयित्री , गद्यकार और चित्रकार महीयसी महादेवी वर्मा का जन्म सन् 1907 ई . को उत्तखटेर भर - भरकर एसा के फर्रुखाबाद में हुआ । उनके स्मृति की रेखाएँ ( 1943 ) . शृंखला की कड़ियाँ ( 1950 ) एवं पथ के साधी जीवन का मानव ( 1954 ) संस्मरणात्मक गद्य बहुत प्रसिद्ध हैं । पथ के साथी में उनके साहित्यिक जीवन के साथियों पन्त नहीं । । निराला . गुप्त , सुभद्रा कुमारी चौहान से संबंधित संस्मरण संकलित हैं । महादेवी वर्मा का काव्य जितना हृदय पटल पर अंकित होता है उतना ही उनका गद्य भी कवित्वपूर्ण , संवेदनात्मक और प्रवाहपूर्ण है । हंसी आ जाती है महादेवी वर्मा सहदया थीं । इनकी सहृदयता सम्पूर्ण साहित्य में झलकती है । अपनी संवेदना को रहने का वचन । कवित्वपूर्ण शैली के माध्यम से मूर्त रूप देने में उन्हें विशेष कौशल प्राप्त है ।

पाठ - परिचय



 महादेवी वर्मा और निराला दोनों ही छायावादी काव्यधारा के प्रमुख स्तम्भ थे । महादेवी वर्मा ने है । न वे मेरी चा निराला को अपना भाई बना लिया था । प्रस्तुत संस्मरण में महादेवी वर्मा ने निराला के औघड़ व्यक्तित्व विचित्र रस्साकर के विभिन्न पहलुओं को उभारा है । महादेवी की दृष्टि में निराला का व्यक्तित्व अव्यवस्थित था , लेकिन पर या उनमें किसी प्रकार का दिखावा और संकीर्णता नहीं थी । निराला अपने नाम के अनुकूल ही थे । बिल्कल अपने - आपको । ही निराले . मस्तमौला , महान और प्रखर व्यक्तित्व के धनी थे । प्रखरता उनके व्यक्तित्व का स्थायी रूप अस्तु । था ।

अनुमान - पत्र में के ज्ञान पर गर्व रुपये चाहिए सकेगा । संध्या एक युग बीत जाने पर भी मेरी स्मृति से एक घटा भरी अश्रुमुखी सावनी पूर्णिमा की रेखाएँ नहीं लखनऊ के किर मिट सकी हैं । उन रेखाओं के उजले रंग न जाने किस व्यथा से गीले हैं कि अब तक सख भी नहीं पाये , की भताजा । उड़ना तो दूर की बात है । उस दिन मैं बिना कुछ सोचे हुए ही भाई निरालाजी से पूछ बैठी थी - " आप के किसी ने राखी नहीं बाँधी ? " अवश्य ही उस समय मेरे सामने उनकी बंधनशून्य कलाई और पीले कच्चे सूत की ढेरी । स्थिति में पहुंचान राखियाँ लेकर घूमने वाले यजमान - खोजियों का चित्र था । पर अपने प्रश्न के उत्तर ने मुझे क्षण - भर के । | उनकी अस्त - व्य लिए चौंका दिया । " कौन बहिन हम ऐसे भुक्खड़ को भाई बनावेगी ! " में उत्तर देने वाले के एकाकी जीवन की व्यथा हुआ रुपया समा बड़े प्रयया चनौती , यह कहना कठिन है ।

 पर जान पड़ता है कि किसी अव्यक्त चुनौती के आभास ने ही मुझे हाथ के अभिषेक की प्रेरणा दी , जिसने दिव्य वर्ण - गध मधु वाले गीत - सुमनों से भारती की अर्चना की है और बर्तन मांजने , पानी भरने जैसी कठिन श्रम - साधना से उत्पन्न स्वेद - बिन्दुओं से मिट्टी का sगार भी किया है । मेरा प्रयास किसी भी जीवंत बवण्डर को कच्चे सूत में बाँधने जैसा था या किसी उच्छल महानद को मोम के तटों में सीमित करने के समान , यह सोचने - विचारने का तब अवकाश नहीं था । पर आने वाले । र निरालाजी के संघर्ष के ही नहीं , मेरी परीक्षा के भी रहे हैं । मैं किस सीमा तक सफल हो सकी हूँ । यह मुझे ज्ञात नहीं : पर लौकिक - दृष्टि से निःस्य निराला हृदय की निधियों में सबसे समृद्ध भाई है , यह स्वीकार करने में मुझे द्विविधा नहीं ।


उन्होंने अपने सहज विश्वास से मेरे कच्चे सूत के बंधन को जो दृढता । और दीप्ति दी है वह अन्यत्र दुर्लभ रहेगी । दिन - रात के पगों से वर्षों की सीमा पार करने वाले अतीत ने आग के अक्षरों में आँसू के रंग । को उत्तरप्रदेश भर - भरकर ऐसी अनेक चित्र - कथाएँ आँक डाली हैं , जितनी इस महान कवि और असाधारण मानव के । पथ के साथी जीवन की मार्मिक झाँकी मिल सकती है । पर उन सबको सम्भाल सके ऐसा एक चित्राधार पा लेना सहज साथियों पन्त , नहीं । काव्य जितना उनके अस्त - व्यस्त जीवन को व्यवस्थित करने के असफल प्रयासों का स्मरण कर मुझे आज भी प्रवाहपूर्ण है । हंसी आ जाती है ।

एक बार अपनी नियंघ उदारता की तीव्र आलोचना सुनने के बाद उन्होंने व्यवस्थित - संवेदना को रहने का वचन दिया । संयोग से तभी उन्हें कहीं से तीन सौ रुपये मिल गये । वही पूँजी मेरे पास जमा करके उन्होंने मुझे अपने खर्च का बजट बना देने का आदेश दिया ।

जिन्हें मेरा व्यक्तिगत हिसाब रखना पड़ता है , वे जानते हैं कि यह कार्य मेरे लिए कितना दुष्कर हादेवी वर्मा ने है । न वे मेरी चादर लम्बी कर पाते हैं न मुझे पैर सिकोड़ने पर बाध्य कर सकते हैं ; और इस प्रकार एक घड़ व्यक्तित्व विचित्र रस्साकशी में तीस दिन बीतते रहते हैं । पर यदि अनुत्तीर्ण परीक्षार्थियों की प्रतियोगिता हो तो सौ में से दस अंक पाने वाला भी थे । बिल्कुल अपने - आपको शून्य पाने वाले से श्रेष्ठ मानेगा । का स्थायी रूप अस्तु , नमक से लेकर नापित तक और चप्पल से लेकर मकान के किराये तक का जो अनुमान - पत्र मैंने बनाया वह जब निरालाजी को पसन्द आ गया , तब पहली बार मुझे अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान पर गर्व हुआ । पर दूसरे ही दिन से मेरे गर्व की व्यर्थता सिद्ध होने लगी ।

 वे सवेरे ही पहुंचे । पचास रुपये चाहिए . . . . . . . किसी विद्यार्थी का परीक्षा शुल्क जमा करना है , अन्यथा वह परीक्षा में नहीं बैठ सकेगा । संध्या होते - होते किसी साहित्यिक मित्र को साठ देने की आवश्यकता पड़ गयी । दूसरे दिन की रेखाएँ नहीं लखनऊ के किसी तांगे वाले की माँ को चालीस मनीआर्डर करना पड़ा । दोपहर को किसी दिवंगत मित्र भी नहीं पाये की भतीजी के विवाह के लिए सौ देना अनिवार्य हो गया । सारांश यह कि तीसरे दिन उनका जमा किया हुआ रुपया समाप्त हो गया और तब उनके व्यवस्थापक के नाते यह दान - खाता मेरे हिस्से आ पड़ा । केसी ने राखी ए क सप्ताह में मैंने समझ लिया कि यदि ऐसे औढर दानी को न रोका जावे तो यह मुझे भी अपनी सूत की ढेरों स्थिति में पहुँचाकर दम लेंगे ।

 तब से फिर कभी उनका बजट बनाने का दुस्साहस मैंने नहीं किया । पर ने क्षण - भर के उनकी अस्त - व्यस्तता में बाधा पहुँचाने का अपना स्वभाव में अब तक नहीं बदल सकी है । बड़े प्रयत्न से बनवाई रजाई , कोट जैसी नित्य व्यवहार की वस्तुएँ भी जब दूसरे ही दिन किसी वन की व्यथा अन्य का कष्ट दूर करने के लिए अन्तर्धान हो गयीतब अर्थ के सम्बन्ध में क्या कहा जावे , जो साधन गरण जी निरालाजी का साधना का मूक साक्षी का दीया मानो अपने नाम स्वर मिल सकता तो वह भी अवकाशन मात्र है ।

                           तर्क की शक्ति वह सध्या भी मेरी स्मृति में विशेष महत्व रखती है जब श्रद्धय मैथिलीशरण जी स्पर्श से मानो आतिथ्य पहण करने गये । बाये दियारालाई काण प्रकाश अधकारमतग जीदिबीच म एवं चन बगल में गाजी के विधीने या बण्डल दबाये , दियारालाई कक्षाण प्रकाश अधकारी स्वयं का मार्ग दिखाते हुए निरालाजी हमें उस करा में ले गयेजा उनका कठार साहित्य - साधना का । रहा है । कि मैंने ठीक र आले पर कपड़े की आधी जली बत्ती से भरा , पर तेल से खाली मिट्टी का दीया मानो आप तक रात में मेर की सार्थकता के लिए उठने का प्रयास कर रहा था ।

यदि उसके प्रयास का स्वर मिल सकता सवेरे निश्चय ही हमें , मिट्टी के तेल की दुकान पर लगी भीड में सबसे पीछे खड़े . पर सबसे बालिश्त पर ज्ञात हुआ कि वे गृह - स्वामी की दीर्घ पर निष्फल प्रतीक्षा की कहानी सुना सकता । रसोईघर में दो - तीन रहे हैं । उनकी लकड़ियाँ , आधी पड़ी घटलोई और खूटी से लटकती हुई आटे की छोटी - सी गठरी आदि । पत के साथ तो उपवारा - चिकित्सा को लाभों की व्याख्या कर रहे थे ।


 यह आलोकरहित , सुख - सुविधा - शून्य घर , गृहस्वामी के विशाल आकार और उससे या खिसकते ही विशालतर आत्मीयता से भरा हुआ था । अपने सम्बन्ध में बेसुध निरालाजा अपन अतिथि की सविधान | अनुभूति नहीं देव लिए सतर्क प्रहरी है । वैष्णव अतिथि की सुविधा का विचार कर ये नया घड़ा खरीद कर गंगाजल ले . | खिलकर वृंत का और धोती - चादर जो कुछ पर में मिल सका सब तख्त पर बिछाकर उन्हें प्रतिष्ठित किया । क्या , ऐसा कोई तारों की छाया में उन दोनों मर्यादावादी और विद्रोही महाकवियों ने क्या कहा - सुना , यह मये ज्ञात नहीं , पर सवेरे गुप्तजी को ट्रेन में बैठाकर वे मुझे उनके सुख - शयन का समाचार देना न भूले । गत म 3 ऐसे अवसरों की कमी नहीं जब वे अकस्मात् पहुँचकर कहने लगे - मेरे इक्के पर कुछ लकड़ियाँ गयी है । शरीर घोड़ा घी आदि रखवा दो । अतिथि आये हैं , घर में सामान नहीं है । उनके अतिथि यहाँ भोजन करने आ जायें , सुनकर उनकी दृष्टि में बालकों जैसा विस्मय छलक मंगवा लें ।


 अब सौ के पुरस्कार आता है । जो अपना घर समझकर आये हैं , उनसे यह कैसे कहा जाये कि उन्हें भोजन के लिए दूसरे पर हिसाब से भेजा जाना होगा । प्रायः - भोजन बनाने से लेकर जूठे बर्तन मांजने तक का काम वे अपने अतिथि देवता के लिए सहर्ष करते पवता कालए सहर्ष करते सरल विश्वास हैं । तैतीस कोटि देवताओं के देश में इस वर्ग के देवताओं की संख्या कम नहीं , पर आधुनिक युग में उनकी | होगा । " पूजा - विधि में बहुत कुछ सुधार कर लिया है । अब अतिथि - पूजा के पर्व कम ही आते हैं और यदि आ - उन्हें भी पड़े तो देवता के अभिषेक , शृंगार आदि संस्कार वेयरा , नौकर आदि ही सम्पन्न करा देते हैं ।


पुजारी । ये हमारे कल्पि गृहपति को तो भोग लगाने की मेज पर उपस्थित रहने भर का कर्तव्य सम्भालना पड़ता है । कुछ देवता इन । इस कर्तव्य से भी मुक्ति देते हैं । | में हँसी का क ऐसे युग में आतिथ्य की दृष्टि से निरालाजी में वही पुरातन संस्कार है जो इस देश के ग्रामीण किसान में मिलता है । उनके भाव की अतल गहराई और अबाध वेग भी आधुनिक सभ्यता के छिछले और भदे भोजन करके जब उन्होंने भाव - व्यापार से भिन्न है । उनकी व्यथा की सघनता जानने का मुझे एक अवसर मिला है । श्री सुमित्रानन्दनजी दिल्ली में क्योंकि उसी टाइफाइड ज्वर से पीड़ित थे । इसी बीच घटित को साधारण और अघटित को समाचार मानने वाले किसी है । समाचार - पत्र ने उनके स्वर्गवास की झूठी खबर छाप डाली ।

                                        निरालाजी कुछ ऐसे आकस्मिकता के साथ आ पहुँचे थे कि मैं उनसे यह समाचार छिपाने का उनकी सुविधा के कारण वे  तिंग सीढ़ियों का मूक साक्षी कता तो वह प्रकाश न पा सकी । समाचार के सत्य में मुझे विश्वास नहीं था , पर निरालाजी तो ऐसे अवसर पर नेरालाजी का सर्फ कोश की शक्ति ही खो बैठते है । लड़खड़ाकर सोफे पर बैठ गये और किसी अव्यक्त वेदना की तरंग के से मानो पाषाण में परिवर्तित होने लगे । उनकी झुकी पलकों से घुटनों पर चूने वाली औसू की बूंद में ऐसे चमक जाती थीं मानों प्रतिमा से झड़े जूही के फूल हो । स्वयं अस्थिर होने पर भी मुझे निरालाजी को सांत्वना देने के लिए स्थिर होना पड़ा । यह सुनकर मने ठीक समाचार जानने के लिए तार दिया है , वे व्यथित प्रतीक्षा की मुद्रा में तब तक बैठे रहे जब तो अपने नाम तक रात जक रात में मेरा फाटक बन्द होने का समय न आ गया ।


सवेरे चार बजे ही फाटक खट - खटाकर जब उन्होंने तार के उत्तर के सम्बन्ध में पूण तब मुझे । श्त भर ज्ञात हुआ कि ये रात भर पार्क में खुले आकाश के नीचे ओस से भीगी दूब पर बैठे सवेरे की प्रतीक्षा करते न अधजला रहे हैं । उनकी निस्तब्ध पीड़ा जव कुछ मुखर हो सकी , तब वे इतना ही कह सके , अब हम भी गिरते है । आदि मानोपंत के साथ तो रास्ता कम अखरता था , पर अब सोचकर ही थकावट होती है । प्रायः एक स्पर्धा का तार हमारे सौहार्द के फूलों को पेंध कर उन्हें एकत्र रखता है । फूल के अड़ते : उससे भी या खिसकते ही काला तार मात्र रह जाता है । इसी से हमें किसी सहयोगी का विछोह अकेलेपन की तीव्र सुविधा के अनुभूति नहीं देता । निरालाजी के सौहार्द और विरोध दोनों एक आत्मीयता के व्रत पर खिले दो फूल है । ।

                 जल ले आये खिलकर व्रत का शृंगार करते है और झड़कर उसे अकेला और सूना कर देते है । मित्र का तो प्रश्न ही क्या , ऐसा कोई विरोधी भी नहीं जिसका अभाव उन्हें विकल न कर देगा । ना , यह मुझे । गत मई मास की लपटों में सांस लेने वाली दोपहरी भी मेरी स्मृति पर एक जलती रेखा खींच न भूले । गयी है । शरीर में शिथिल और मन से क्लांत निरालाजी मलिन फटे अधोवस्त्र को लपेटे और वैसा ही लकड़ियाँ जीर्ण - शीर्ण उत्तरीय ओढ़े धूलि - धूसरित पैरों के साथ मेरे द्वार पर आ उपस्थित हुए । " अपरा " पर इक्कीस सौ के पुरस्कार की सूचना मिलने पर उन्होंने मुझे लिखा था कि मैं अपनी सांस्थिक मर्यादा से वह रुपया स्मय छलक मैंगवा लूँ । अब वे कहने आये थे कि स्वर्गीय मुंशी नवजादिक लाल की विधवा को पचास प्रति मास के ए दूसरे घर | हिसाब से भेजने का प्रबन्ध कर दिया जाये । " उक्त धन का कुछ अंश भी क्या वे अपने उपयोग में नहीं ला सकते " के उत्तर में उन्होंने उसी सहर्ष करते सरल विश्वास के साथ कहा - " वह तो संकल्पित अर्थ है ।


अपने लिए उसका उपयोग करना अनुचित ग में उनकी होगा । " र यदि आ 15 उन्हें व्यवस्थित करने के सभी प्रयास निष्फल रहे हैं . पर आज मुझे उनका खेद नहीं है । यदि हैं । पुजारी वे हमारे कल्पित साँचे में समा जाएँ तो उनकी विशेषता ही क्या रहे । कुछ देवता इ न बिखरे पृष्ठों में एक पर अनायास ही दृष्टि रुक जाती है । उसे मनोरमृति ने विषाद की आर्द्रता में हँसी का कुमकुम घोलकर अंकित किया है । के ग्रामीण साहित्यकार - संसद में सब सुविधाएँ सुलभ होने पर भी उन्होंने स्वयं - पाकी बनकर और एक बार भोजन करके जो अनुष्ठान आरम्भ किया था उसकी तो मैं अभ्यस्त हो चुकी थी । पर अचानक एक दिन न और भदे जब उन्होंने पाव भर गेरू मैंगवाने का आदेश दिया तब मैंने समझा कि उनको पित्ती निकल आयी है . क्योंकि उसी रोग में गेरू मिले हुए आटे के पूए खाये जाते हैं और गेरू के चूर्ण का अंगराग लगाया जाता । दिल्ली में प्रश्नों के प्रति निरालाजी कम सहिष्णु हैं और कुतूहल की दृष्टि से मैं कम जिज्ञासु हूँ । फिर भी उनकी सविधा - असुविधा की चिन्ता के कारण मैं अनेक प्रश्न कर बैठती हूँ और मेरी सदभावना में विश्वास छिपाने का के कारण वे उत्तरों का कष्ट सहन करते हैं । वाले किसी  से  लेंगरके उसी परिच जाते हैं जहाँ जो से चाहे विस्म सत्व इसी से जीवन के सदस्य है हाथ से अधिन नहीं होती ।


ऑन की सिकुड़न मेरे मौन में मुखर चिन्ता के कारण ही उन्होंने अपना मंतव्य स्पष्ट किया - ' हम अब सन्यासी मेरी उमड़ती हैसी को व्यथा के बाँध ने जहाँ - का - तहाँ ठहरा दिया । इस निर्मम युग ने इस महान कला के पास ऐसा क्या छोडा है जिसे स्वयं छोडकर यह त्याग का आत्मताप भा प्राप्त कर सका जिस प्राप्ति हमारी कृतार्थता का फल है उसी प्रकार त्याग हमारी पूर्णता का परिणाम हा इन दोनों छोरी से एक मनुष्य के भौतिक विकास का माप है और दूसरा मानसिक विस्तार का थाहा त्याग कभी भार की अस्वीकृति है और कभी अभाव की स्वीकृति , पर तत्त्वतः दोनों कितने भिन्न है । मैं सोच ही रही थी चि . वसंत ने परिहास की मुद्रा में कहा - ' तब तो अपको मधुकरी खानेही आवश्यकता पड़ेगी ।



 खेद , अनुताप या पश्चाताप की एक भी लहर से रहित विनोद की एक प्रशान्त धारा पर और हुआ निरालाजी का उत्तर आया - " मधुकरी तो अब भी खाते है । " जिसकी निधियों से साहित्य का कोण समृद्ध है उसने मधुकरी माँगकर जीवन - निर्वाह किया है . इस कटु सत्य पर आने वाले युग विश्वास कर सकेंगे , यह कहना कठिन है । गेरू में दोनों मलिन अधोवस्त्र और उत्तरीय कब रंग डाले गये इसका मुझे पता नहीं , पर एकादशी के सवेरे स्नान , हवन आदि कर जब ये निकले तब गैरिक परिधान पहन चुके थे । अंगोछे के अभाव और वस्त्रों में रंग की अधिकता के कारण उनके मुँह - हाथ आदि ही नहीं , विशाल शरीर भी गैरिक हो गया था . मानो सुनहली धूप में पुला गेरू के पर्वत का कोई शिखर हो ।
बोले - " अब ठीक है । जहाँ पहुँचे , किसी नीम - पीपल के नीचे बैठ गये । दो रोटियाँ माँगकर खा ली और गीत लिखने लगे । इस सर्वया नवीन परिच्छेद का उपसंहार कहाँ और कैसे होगा यह सोचते - सोचते मैंने उत्तर दिया - " आपके संन्यास से मुझे तो इतना ही लाभ हुआ कि साबुन के कुछ पैसे बचेंगे । गेरुए वस्त्र तो मैले नहीं दिखेंगे | पर हानि यही है कि न जाने कहाँ - कहाँ छप्पर डलवाना पड़ेगा , क्योंकि धूप और वर्षा से पूर्णतया रक्षा करने वाले नीम और पीपल कम ही हैं मन में एक प्रश्न बार - बार उठता है . क्या इस देश की सरस्वती अपनी वैरागी पुत्रों की परम्परा अक्षुण्ण रखना चाहती है और क्या इस पथ पर पहले पग रखने की शक्ति उसने निरालाजी में ही पायी है ? व्यक्त स्वाद उनके तीखे उसके प्रति हमारी घृणा की आवश्यक की शक्ति भी रंग फेर कर मूल में भी य नहीं । वि संचित कर तो घृणा की निरालाजी अपने शरीर , जीवन और साहित्य सभी में असाधारण हैं । उनमें विरोधी तत्वों की भी सामंजस्यपूर्ण सन्धि है ।

उनका विशाल डीलडौल , देखने वाले के हृदय में जो आतंक उत्पन्न कर देता है उसे उनके मुख की सरल आत्मीयता दूर करती चलती है । उनकी दृष्टि में दर्य और विश्वास की धूप - छाँही द्वाभा है । इस वर्ण का सम्बन्ध किसी हल्की । मनोवृत्ति से नहीं और न उसे अहं का सस्ता प्रदर्शन ही कहा जा सकता है । अविराम संघर्ष और निरन्तर विरोध का सामना करने में उनमें जो एक आत्मनिष्ठा उत्पन्न हो गयी है उसी का परिचय हम उनकी दृप्त दृष्टि में पाते हैं । कभी - कभी यह गर्व व्यक्ति की सीमा पार कर इतना सामान्य हो जाता है कि हम उसे अपना , प्रत्येक साहित्यकार का या साहित्य का मान सकते हैं । इसी से वह दुर्वह कभी नहीं होता । जिस बड़प्पन में हमारा भी कुछ भाग है वह हम में छोटेपन की अनुभूति नहीं उत्पन्न करता और परिणामतः उसस हमारा कभी विरोध नहीं होता । हल्की वस्तु सुगन्ध ननि किचित मात्र अडिग शिल में आह भर मर निरालाजी की दृष्टि में संदेह का वह पैनापन नहीं जो दूसरे मनुष्य के व्यक्त परिचय का अविश्वास कर उसके मर्म को बेधना चाहता है । उनका दृष्टिपात उनके सहज विश्वास की वर्णमाला है । वह चाहता है ।



 प्रयासहीन  सी परिचय को सत्य मानकर चलते ह जिसे वह देना चाहता है और अन्त में उस स्थिति तक पहुंच । जहाँ वह सत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं देना चाहता । जो कलाकार हृदय के गूढतम भावों के विश्लेषण में समर्थ है उसमें ऐसी सरलता लौकिक दृष्टि । चाहे विस्मय की वस्तु हो , पर कला - सृष्टि के लिए यह स्वाभाविक साधन है । । सत्य का मार्ग सरल है । तर्क और संदेह की चक्करदार राह से उस तक पहुँचा नहीं जा सकता । मी से जीवन के सत्य द्रष्टाओं को हम बालकों जैसा सरल विश्वासी पाते हैं । निरालाजी भी इसी परिवार VIP HTTY HYPr के सदस्य हैं । किसी अन्याय के प्रतिकार के लिए उनका हाथ लेखनी से पहले उठ सकता है अथवा लेखनी । हाथ से अधिक कठोर प्रहार कर सकती है , पर उनकी आँखों की स्वच्छता किसी मलिन द्वेष में तरंगायित नहीं होती । ओंठो की खिंची हुई सी रेखाओं में निश्चय की छाप है , पर उनमें क्रूरता की भंगिमा या घृणा की सिकुडन नहीं मिल सकती । करता और कायरता में वैसा ही संबंध है जैसा वृक्ष की जड़ में अव्यक्त रस और उसके फल के व्यक्त स्वाद में ।


 निराला किसी से भयभीत नहीं , अतः किसी के प्रति क्रूर होना उनके लिए सम्भव नहीं । उनके तीखे व्यंग्य की विद्युत - रेखा के पीछे सदभाव के जल से भरा बादल रहता है । घृणा का भाव मनुष्य की असमर्थता का प्रमाण है जिसे तोड़कर हम इच्छानुसार गढ़ सकते हैं . ' उसके प्रति घृणा का अवकाश ही नहीं रहता , पर जिससे अपनी रक्षा के लिए हम सतर्क हैं उसी की स्थिति हमारी घृणा का केन्द्र बन जाती है । जो मदिरा के पात्र को तोड़कर फेंक सकता है , उसे मदिरा से घृणा की आवश्यकता ही क्या है !


पर जो उसे सामने रखने के लिए भी विवश है और अपने मन में उससे बचने की शक्ति भी संचित करना चाहता है वह उसके दोषों की एक - एक ईंट जोड़कर उस पर घृणा का काला रंग फेर कर एक दीवार खड़ी कर लेता है , जिसकी ओट में स्वयं बच सके । हमारे नरक की कल्पना के मूल में भी यही अपने बचाव का विवश प्रयत्न है । जहाँ संरक्षित दोष नहीं , वहीं संरक्षित घृणा भी संभव नहीं । विकास - पथ की बाधाओं का ज्ञान ही महान् विद्रोहियों को कर्म की प्रेरणा देता है । क्रोध को संचित कर द्वेष को स्थायी बनाकर घृणा में बदलने के लम्बे क्रम तक वे ठहर नहीं सकते और ठहरें भी तो घृणा की निष्क्रियता उन्हें निष्क्रिय बनाकर पथ भ्रष्ट कर देगी । निरालाजी विचार से क्रांतदर्शी और आचरण से क्रान्तिकारी हैं । वे उस झंझा के समान हैं जो हल्की वस्तुओं के साथ भारी वस्तुओं को भी उड़ा ले जाती है ।

 उस मन्द समीर जैसी नहीं जो सुगन्ध न मिले तो दुर्गन्ध का भार ही ढोता फिरता है । जिसे वे उपयोगी नहीं मानते उसके प्रति उनका किंचित मात्र भी मोह नहीं , चाहे तोड़ने योग्य वस्तुओं के साथ रक्षा के योग्य वस्तुएँ भी नष्ट हो जाएँ । उनका मार्ग चाहे ऐसे भग्नावशेषों से भर गया हो जिनके पुनर्निर्माण में समय लगेगा , पर ऐसी अडिग शिलाएँ नहीं हैं , जिनको देख - देखकर उन्हें निष्फल क्रोध में दाँत पीसना पड़े या निराश पराजय में आह भरनी पड़े । मनुष्य की संचय - वृत्ति ऐसी ही है कि वह अपनी उपयोग हीन वस्तुओं को भी संगृहीत रखना चाहता है । इसी स्वभाव के कारण बहुत - सी रूढ़ियाँ भी उसके जीवन के अभाव को भर देती है । विद्रोह स्वभावतः होने के कारण निरालाजी के लिए ऐसी रूढ़ियों पर प्रहार करना जितना प्रयासहीन होता है , उतना ही कौतुक का कारण ।




दूसरों की बद्धमूल धाराओं पर आघात कर उसकी खिजलाहट पर वे एस हाप्र होली के दिन कोई नटखट लड़का , जिसने किसी की तीन पैर की कुर्सी के साथ किसा का चारपाई . किसी की टी तिपाई के साथ किसी की नयी चौकी होलिका में स्वाहा कर डाला हा । । उनका विरोध द्वेषमलक नहीं पर चोट कतिन होती है । इसके अतिरिक्त उनके संकल्प और कार्य के बीच में ऐसी प्रत्यक्ष कड़ियाँ नहीं रहतीं जो संकल्प के औचित्य और कर्म के सौन्दर्य का व्याख्या कर सके । उन्हें समझने के लिए जिस मात्रा में बौद्धिकता चाहिए उसी मात्रा में हृदय की संवेदनशीलता अपेक्षित रहती है ।

ऐसा सन्तुलन सुलभ न होने के कारण उन्हें पूर्णता में समझने वाले विरल मिलते हैं । ऐसे दो । व्यक्ति सब जगह मिल सकते हैं जिनमें एक उनकी नम्र उदारता की प्रशंसा करते नहीं थकता और दूसरा उनके उद्धृत व्यवहार की निन्दा करते नहीं हारता । जो अपनी चोट के पार नहीं देख पाते वे उनके निकट पहचहा नहीं सकते , अतः उनके विद्रोह की असफलता प्रमाणित करने के लिए उनके चरित्र की उजली रेखाओं पर काली तूली फेरकर प्रतिशोध लेते रहते हैं । निरालाजी के सम्बन्ध में फैली हुई भ्रांत किंवदंतियाँ इसी निम्न वृत्ति से सम्बन्ध रहती हैं । - मनुष्य जाति की नासमझी का इतिहास क्रूर और लम्बा है । प्रायः सभी युगों में मनुष्य ने अपने में श्रेष्ठतम , पर समझ में आने वाले व्यक्ति को छाँटकर , कभी उसे विष देकर , कभी सूली पर चढ़ाकर और कभी गोली का लक्ष्य बनाकर अपनी बर्बर मूर्खता के इतिहास में नये पृष्ठ जोड़े हैं ।


 प्रकृति और चेतना न जाने कितने निष्फल प्रयोगों के उपरांत ऐसे मनुष्य का सृजन कर पाती है । जो अपने स्रष्टाओं से श्रेष्ठ हो । पर उसके सजातीय , ऐसे अद्भुत सृजन को नष्ट करने के लिए इससे बड़ा कारण खोजने की भी आवश्यकता नहीं समझते कि वह उनकी समझ के परे हैं अथवा उनका सत्य इनकी भ्रांतियों से मेल नहीं खाता । निरालाजी अपने युग की विशिष्ट प्रतिभा हैं , अतः उन्हें अपने युग का अभिशाप झेलना पड़े तो आश्चर्य नहीं । उनके जीवन के चारों ओर परिवार का वह लौहसार घेरा नहीं है जो व्यक्तिगत विशेषताओं पर चोट भी करता है और बाहर की चोटों के लिए ढाल भी बन जाता है । उनके निकट माता , बहिन , भाई आदि के कोंपल उनके लिए पत्नी - वियोग का पतझड़ बन गया है ।


आर्थिक कारणों ने उन्हें अपनी मातृहीन संतान के प्रति कर्त्तव्य - निर्वाह की सुविधा भी नहीं दी । पुत्री के अन्तिम क्षणों में वे निरुपाय दर्शक रहे और पुत्र को उचित शिक्षा से वंचित रखने के कारण उसकी उपेक्षा के पात्र बने । अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों से उन्होंने कभी ऐसी हार नहीं मानी जिसे सहय बनाने के लिए हम समझौता करते हैं । स्वभाव से उन्हें यह निश्छल वीरता मिली है , जो अपने बचाव के प्रयत्न को भी कायरता की संज्ञा देती है । उनकी राजनैतिक कुशलता नहीं , वह तो साहित्य की एकनिष्ठता का पर्याय है । छल के व्यूह में छिपकर लक्ष्य तक पहुँचने को साहित्य लक्ष्य प्राप्ति नहीं मानता जो अपने पथ की । सभी प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष बाधाओं को चुनौती देता हुआ , सभी आघातों को हृदय पर झेलता हुआ लक्ष्य तक । पहुँचता है उसी को युग - स्रष्टा साहित्यकार कह सकते हैं । निरालाजी ऐसे ही विद्रोही साहित्यकार : जिन अनुभवों के दर्शन का विष साधारण मनुष्य की आत्मा को मूर्छित करके उसके सारे जीवन का । विषाक्त बना देता है , उसी से उन्होंने सतत् जागरूकता और मानवता का अमृत प्राप्त किया है । अर्थ की जिस शिला पर हमारे युग के न जाने कितने साधकों की साधना तरियों चूर - चूर चुकी हैं , उसी को वे अपने अदम्य वेग में पार कर आये हैं । उनके जीवन पर उस संघर्ष के जो आप हैं वे उनकी हार के नहीं शक्ति के प्रमाण - पत्र हैं ।


उनके कठोर श्रम , गम्भीर दर्शन और सजग कला  गन्न होते है और विषेणी न अछार मरु में सूखती है न अकूल समुद्र में अस्तित्व खोती है । की सांगपूर्ण जीवन की दृष्टि से निरालाजी किसी दुर्लभ सीप में ढले सुढील मोती नहीं है । जिसे अपनी डाली हो । महायता का साथ देने के लिए स्वर्ण और सौन्दर्य - प्रतिष्ठा के लिए अलंकार का रूप चाहिए । वे तो अनगढ़ कल्प और कार्यपारस के भारी शिला - खण्ड है । न मुकुट में जड़कर कोई उसकी गुरुता सम्भाल सकता है और न पदत्राण की व्याख्या कर बनाकर कोई उसका भार उठा सकता है । वह जहाँ है , वहीं उसका स्पर्श सुलभ है । यदि स्पर्श करने वाले शीलता अपेक्षित में मानवता के लौह परमाणु हैं तो किसी ओर से भी स्पर्श करने पर वह स्वर्ण बन जायेगा ।


 पारस की लते हैं । ऐसे दो अमूल्यता दूसरों का मूल्य बढ़ाने में है । उसके मूल्य में न कोई कछ जोड सकता है , न घटा सकता है । कता और दूसरा आज हम दम्भ और स्पर्धा , अज्ञान और भ्राति की ऐसी कुहेलिका में चल रहे है जिसमें स्वयं को वे उनके निकट पहचानना तक कठिन है , सहयात्रियों को यथार्थता में जानने का प्रश्न ही नहीं उठता । पर आने वाले गुग । रित्र की उजली इस कलाकार की एकाकी यात्रा का मूल्य आँक सकेंगे . जिसमें अपने पैरों की चाप तक आंधी में खो जाती मांत किंवदंतियों मनुष्य ने अपने र चढाकर और निरालाजी के साहित्य की शास्त्रीय विवेचना तो आगामी युगों के लिए भी सुकर रहेगी , पर उस विवेचना के लिए जीवन की जिस पृष्ठभूमि की आवश्यकता होती है , उसे तो उनके समकालीन ही दे सकते न कर पाती है . साहित्यकार के जीवन का विश्लेषण उसके साहित्य के मूल्यांकन से कठिन है ।


                                          साहित्य की के लिए इससे कसौटी सर्वमान्य होती है , पर उसकी उर्वर भूमि आलोचक के विशेष दृष्टि बिन्दु को फूलने - फलने का वा उनका सत्य अवकाश दे सकती है । एक कविता का विशेष भाव , एक चित्र का रंग और गीत की विशेष लय , किसी के लिए रहस्य के द्वार खोल सकती है और किसी से टकरा कर व्यर्थ हो जाती है । पर जीवन का इतिवृत्त झेलना पड़े तो इतनी विविधता नहीं सम्भाल सकता । एक व्यक्ति का कर्म समाज को हानि पहुंचा सकता है या लाभ . अतः व्यक्तिगत रुचि के कारण यदि कोई हानि पहुँचाने वाले को अच्छा कहे या लाभ पहुँचाने वाले को विशेषताओं पर बुरा , तो समाज उसे अपराधी मानेगा । ऐसी स्थिति में कर्म के मूल्यांकन में विशेष सतर्क रहने की ता . बहिन भाई आवश्यकता पड़ती है । अपनी मातृहीन असाधारण प्रतिभावान और अपने युग से आगे देखने वाले कलाकारों के इतिवृत्त के चित्रण में पाय दर्शक रहे एक और भी बाधा है ।

                              जब उनके समानधर्मी उनके जीवन का मूल्यांकन करते हैं तब कभी तो स्पर्धा उनकी बनाने के लिए तुला को ऊँचा - नीचा करती रहती है . कभी अपनी विशेषताओं का मोह उन्हें सहयोगियों में अपनी प्रतिकृति प्रयत्न को भी | देखने के लिए विवश कर देता है । जब छोटे व्यक्तित्व वाले किसी असाधारण व्यक्तित्व की व्याख्या करने उता का पर्याय चलते हैं तब कभी तो उनकी लघुता उन्हें घर नहीं पाली और कभी उसके तीव्र आलोक में अपने अहं को - अपने पथ की उद्भासित करने की दुर्बलता उन्हें घेर लेती है । हुआ लक्ष्य तक इस प्रकार महान कलाकारों के यथार्थ चित्र व्याख्या बहुल हों तो विस्मय की बात नहीं । साहित्यकार हैं । साहित्य के नवीन युग - पथ पर निरालाजी की अंक - संसृति गहरी और स्पष्ट , उज्ज्वल और सारे जीवन को लक्ष्यनिष्ठ रहेगी । इस मार्ग के हर फूल पर उनके चरण का चिह और हर शूल पर उनके रक्त का रंग कया है । न्या चूर - चूर हो के जो आघात सजग कला की त्रिवेणी न अछोर मरु में सूखती है। 

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