अग्नि की उड़ान NCERT 11 कक्षा सार


Thursday, 17 October 2019






अग्नि की उड़ान NCERT 11 कक्षा सार 


                                                                                              - ए . पी . जे . अब्दुल कलाम 


अग्नि की उड़ान NCERT 11 कक्षा सार 



लेखक - परिचय 


                                   भारतरत्न पूर्व राष्ट्रपति डॉ . ए . पी . जे . अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु के छोटे से द्वीप धनुषकोडी पर 15 अक्टूबर 1931 को हुआ था । इनका पूरा नाम अबुल पाकीर जैनुलआबदीन अब्दुल कलाम था । ये मिसाइल मैन के नाम से मशहूर है । उपग्रह प्रक्षेपण यान और मिसाइलों के स्वदेशी विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है । इन्होंने हिन्दुस्तान को परमाणु ताकत बनाया और अग्नि , पृथ्वी , त्रिशूल जैसी स्वदेशी मिसाइलों का भी निर्माण किया । देशभक्ति इनमें कूट - कूट कर भरी थी । उन्होंने भारत को 2020 तक विकसित बनाने का सपना देखा और इसके लिए युवाओं को आगे आने के लिए प्रेरित किया । वे युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणापुंज थे । उन्हीं के अथक प्रयासों से भारत रक्षा तथा वायु आकाश प्रणालियों में आत्मनिर्भर बन सका । वे महान भारत के वास्तविक प्रतीक , आदर्श नागरिक और कहा ? सर्वाधिक सकारात्मक भारतीय थे । वे कहते थे कि महान सपने देखने वालों के सपने हमेशा श्रेष्ठ होते हैं और इसी को उन्होंने अपनी मनसा , वाचा , कर्मणा से जिंदगी की आखिरी सांस तक फलीभूत भी किया । उन्होंने भारत के विकास स्तर को विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए एक विशिष्ट सोच प्रदान की तथा अनेक वैज्ञानिक प्रणालियों तथा रणनीतियों को कुशलतापूर्वक सम्पन्न कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । जितने ये श्रेष्ठ व्यक्तित्व के धनी थे उतना ही इनका लेखन प्रखर था । ऐसे प्रबुद्ध राष्ट्र भक्त , चिंतक , वैज्ञानिक का 27 जुलाई 2015 को युवाओं के बीच कर्म संदेश देते हुए देहावसान हो गया । ववाद का रूप दिय .


पाठ - परिचय



                        प्रस्तुत आत्मकथा में अब्दुल कलाम से मिसाइल मैन बनने की पूरी कहानी है । लेखक ने अपने व्यक्तिगत जीवन के संघर्ष के साथ अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों का भी विवरण इसमें दिया है । साथ ही वे इसमें यह भी बताते हैं कि तकनीकी परियोजनाएँ किस प्रकार के प्रबंधन और सहयोग से सफल होती है । वे बताते हैं कि सामूहिक प्रयास से ही कोई परियोजना सफल हो सकती है । राष्ट्रीय आकांक्षा , वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता एवं प्रौद्योगिकी दक्षता हासिल करने के भारत के प्रयासों का पूरा चित्रण इसमें किया गया है । उनकी इस आत्मकथा का एक अंश ही यहां संकलित किया गया है । ।

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टेक्नोलॉजी विज्ञान से भिन्न एक सामूहिक गतिविधि है । यह किसी एक व्यक्ति की बुद्धि या समझ पर आधारित नहीं होती बल्कि कई व्यक्तियों की आपसी बौद्धिक प्रतिभा पर आधारित होती है । रा मानना है कि आई . जी . एम . डी . पी . की सबसे बड़ी सफलता का तथ्य यह नहीं है कि देश ने रिकॉर्ड   समय के भीतर पाँच मिसाइल प्रणालियाँ विकसित कर लेने की क्षमता हासिल कर ली , बल्कि तथ्य है कि इसके माध्यम से वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों की कुछ सर्वश्रेष्ठ टीमें तैयार हो गई ।

 अगर कोई मदद भारतीय रॉकेट विज्ञान में मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि के बारे में पूछता है तो मैं बताऊंगा कि मैंने नौजवान की टीमों के लिए एक ऐसा माहौल तैयार किया जिसमें वे अपने दिल और आत्मा को सहर्ष अपने मिशन में लगा सकें ।अपने निर्माण के दौर में टीमें बच्चों की तरह ही होती हैं । वे एकदम उत्तेजनशील , ओजस्विता उत्साह एवं उत्सुकता से भरपूर और अपने को विशिष्ट दिखाने की इच्छा लिये होती हैं ।

      हालाँकि बहका हुए अभिभावक अपने व्यवहार से इन बच्चों की सकारात्मक विशेषताओं , गुणों को नष्ट कर सकते है टीमों की सफलता के लिए काम का माहौल ऐसा होना चाहिए जो कुछ नया करने का अवसर प्रदान करे । डी . टी . डी . एंड पी . ( एयर ) . इसरो , डी . आर . डी . ओ . और दूसरी जगहों पर काम करने के दौरान मैंने ऐसीम चुनौतियों का मुकाबला किया है , लेकिन अपनी टीमों को हमेशा ऐसा माहौल देना सुनिश्चित किया जिसन वे कुछ नया कर सकें और जोखिम उठा सकें । एस . एल . वी . - 3 परियोजना और बाद में आई . जी . एम . डी . पी . के दौरान हमने पहले परियोजना टीमें बनानी शुरू की तो इन टीमों में काम कर रहे लोगों ने अपने को अपने संगठनों की महत्त्वाकांक्षाओं । की अग्रिम पंक्ति में पाया ।
 चूंकि इन टीमों में एक तरह से मनोवैज्ञानिक निवेश किया गया था . इसलिए वि वे बहुत ही सुस्पष्ट और अति संवेदनशील बन गई । सामूहिक यश लेने के लिए वे एक - दूसरे से व्यक्तिगत । हो रूप से विषमानुपात में काम करने की उम्मीद करते । मैं यह जानता था कि संगठन व्यवस्था में किसी भी तरह की असफलता टीम में किए गए निवेश एव को बेकार कर देगी ।

 इन टीमों को औसत कार्य समूहों के जिम्मे कर दिया जाता और वहाँ भी ये असफल ज हो सकती थीं तथा मान्य शर्तों के तहत उनके लिए जो बड़ी - बड़ी महत्त्वाकांक्षाएँ सँजोई गई थी , वे पूरी देन नहीं हो पातीं । कई अवसरों पर तो संगठन अपनी शक्ति खो चुकने के किनारे पर था , अतः कई पा प्रतिबंध लगाने पड़े । म एस . एल . वी . परियोजना के शुरुआती वर्षों में मुझे शीर्ष स्तर पर प्रायः अधीरता का सामना करना । पड़ा था , क्योंकि काम में प्रगति तत्काल नजर नहीं आ रही थी ।

कई लोगों का मानना था कि । एस . एल . वी . - 3 पर अब संगठन का नियंत्रण नहीं रह गया था , जिससे टीमें उच्छृखल हो जाएँगी और अनुशासनहीनता फैलेगी तथा संगठन में अव्यवस्था मच जाएगी और संदेह पैदा होने लगेंगे । लेकिन सभा अवसरों पर ये आशंकाएँ काल्पनिक साबित हुई । संगठनों में कई व्यक्ति बहुत ही मजबूत स्थिति में या उदाहरण के लिए . वी . एस . एस . सी . में , जिन्होंने टीमों को सौंपे गए सांगठनिक लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता एवं जिम्मेदारियों को हमेशा कम करके आंका , वे हमेशा गलत सिद्ध हुए । जब आप एक परियोजना टीम के रूप में काम करते हैं तो आपको सफलता की कसौटी का मिली - जुली दृष्टि विकसित करनी होगी । हर टीम के काम में हमेशा बहविध और विरोधाभासा बनी रहती हैं । अच्छी परियोजना टीमें उस मूल तत्त्व और उन मुख्य लोगों को फौरन पहचान लन होती हैं , जिनसे सफलता की कसौटी तय कर ली जानी चाहिए । टीम के नेता की भूमिका निर्णायक पक्ष ऐसे मुख्य लोगों से उनकी जरूरतों के बारे में बातचीत कर लेने तथा उनको प्रभा का होता है और टीम नेता को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि जैसे - जैसे परिस्थितिया । हों या बदलें , तत्त्व पर नजर जमी रहे . मुख्य लोगों और अन्य लोगों के बीच संवाद नियमित रूप रहे । ।

अपमान न पहचान लेने में समर्थ " भूमिका का एक उनको प्रभावित करने स्थितियाँ विकसित नियमित रूप से जारी  एस . एल . वी . - 3 टीम ने स्वयं ही आंतरिक सफलता की कसौटी विकसित की थी । स्वयं ही अपने स्ट मानदंड , उम्मीदें और लक्ष्य निर्धारित किए थे । हमें सफलता हासिल करने के लिए क्या - क्या करने जरूरत है और हम सफलता को कैसे ऑर्केगे , यह भी हमने खुद ही तय किया था । उदाहरण के लिए , म अपने कार्यों को किस तरह पूरा करने जा रहे हैं . कौन क्या करेगा और किन मापदंडों के अनुसार करेगा , समय सीमाएँ क्या है और संगठन में टीम दूसरों के संदर्भ में खुद कैसे काम करेगी । किसी भी टीम में सफलता की कसौटी तक पहुँचने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल एवं कौशलयुक्त होती है , क्योंकि एक ही छत के नीचे काफी कुछ घटित होता है । जबकि साधारण तौर पर टीम बाहर से परियोजना के लक्ष्यों को हासिल करने के उद्देश्य से ही काम करती है । लेकिन मैने बार - बार देखा है कि लोग यही तय नहीं कर पाते कि वे क्या करना चाहते हैं और फिर भी कार्यशाला में जब उनके सामने कोई काम होता है तो वे उसे करना नहीं चाहते । असल में एक परियोजना टीम के सदस्य को जासूस की तरह होना चाहिए । उसे यह देखते रहना चाहिए कि परियोजना का काम किस प्रकार आगे बढ़ रहा है और फिर परियोजना की जरूरतों के बारे में स्पष्ट , व्यापक और गहरी समझ बनाने के लिए विभिन्न सबूतों को एक साथ रखकर उन पर विचार करना चाहिए ।

दूसरे स्तर पर परियोजना नेता को टीमों एवं कार्य केन्द्रों के बीच सम्बन्ध को बढ़ावा देने तथा विकसित करने का काम करना चाहिए । दोनों ही पक्षों को अपनी आपसी समझ के बारे में बहुत ही स्पष्ट होना चाहिए और दोनों को ही परियोजना में बराबर का पूर्ण रूप से साझेदार होना चाहिए । फिर भी दूसरे स्तर पर हरेक पक्ष को दूसरे पक्ष की क्षमताओं का आकलन करते रहना चाहिए और एक - दूसरे की शक्ति एवं कमजोरियों के बारे में जानते रहना चाहिए ताकि यह तय किया जा सके कि क्या किए जाने की जरूरत है और इसे कैसे किया जाना चाहिए । दरअसल यह पूरा खेल ठेकेदारी की प्रक्रिया के रूप में | देखा जा सकता है । यह संभावनाएँ तलाशने और किसी समझौते पर पहुँचने को लेकर है . जिसमें एक पार्टी दूसरी से कुछ अपेक्षाएँ करती है । यह दूसरी पार्टी के दबावों को यथार्थवादी समझ के बारे में है , यह सफलता की कसौटी को बताने के बारे में और उन साधारण नियमों की व्याख्या करने के बारे में है - जिसमें कार्य करने से सम्बन्ध स्थापित करने के बारे में बताया जाता है । लेकिन इन सबसे ऊपर यह तकनीकी एवं व्यक्तिगत स्तरों पर स्पष्ट सम्बन्ध विकसित करने को लेकर है ।

 आई . जी . एम . डी . पी . में शिवधान पिल्लै और उनकी टीम ने स्व विकसित तकनीक - पी . ए . सी . ई यानि प्रोग्राम एनालिसिस कंट्रोल | एंड इवेल्यूएशन के माध्यम से इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करके दिखाया था । वह रोजाना बारह से | एक बजे तक परियोजना टीम के सदस्यों तथा किसी एक कार्य केन्द्र के साथ बैठने और उनके बीच सफलता का स्तर बनाने का काम करते । सफलता कैसे हासिल की जाए और भविष्य की दृष्टि क्या हो . इसकी योजना ही सफलता के लिए प्रेरणा उत्पन्न करती है ; जो कि मैंने खुद पाया है , और हमेशा चीजों को साकार बनाती है । तकनीकी प्रबंधन की अवधारणा की जड़े विकासात्मक प्रबंधन मॉडलों में निहित हैं , जोकि साठ के दशक के शरू में सदभाव एवं उत्पादनमुखी प्रबंधन ढाँचे के बीच विवाद से शुरू हुई थी । मुख्य रूप स दो तरह की प्रबंधन स्थितियाँ होती हैं , एक - प्राइमल , जिसमें आर्थिक कर्मचारी का मूल्य महत्ती होता | है और दूसरी - रेशनल . जिसमें संगठनात्मक कर्मचारी का मूल्य मुख्य होता है । प्रबंधन को लेकर मेरी जो अवधारणा है वह उस कर्मचारी के इर्द - गिर्द है , जो तकनीकी व्यक्ति है । जबकि प्राइमल मैनेजमेंट स्कूल पतया को उनकी स्वतन्त्रता के लिए मान्यता देता है ; जबकि रेशनल मैनेजमेंट उन्हें उनकी निर्भरता लिए अभिस्वीकृति देता है । मैं उन्हें उनकी अन्तनिर्भरता के रूप में लेकर चलता हूँ ।

 जहाँ प्राइमल मैनेजर  तालीस से ज्य इसके अला विशिष्ट जरूरतो भाजन विचारों को कोही किया । ममता को प्रदशि आई . सफलता एवं इ अंतरिक्ष या पैसे की ताव मार दिया । कारण होत अन ने भारत टेक्नोलॉजी सि विज्ञान से भिन्न स्वतंत्र उद्यम लेकर चलते हैं वहीं रेशनल मैनेजर आपसी सहयोग से काम करता है - और मैं एक अंतर्निर्भर संयुक्त उद्यम लेकर चलता है , सभी को साथ लेकर - नेटवर्क , संसाधनों , कार्यक्रम निर्धारण , मूल्य , लागत । आदि सभी को । अब्राहम मैसलो पहले व्यक्ति थे , जिन्होंने स्व कार्यान्वयन के नए मनोविज्ञान को अवधारणा के स्तर पर बहस के लिए प्रस्तुत किया । यूरोप में रुडोल्फ स्टैनर और रेग रेवांस ने इस अवधारणा को व्यक्तिगत शिक्षा की प्रणाली तथा संगठनात्मक नवीनीकरण के रूप में विकसित किया ।

एंग्लो - जर्मन प्रबंध दार्शनिक फ्रिट्ज शुएशर ने बौद्ध अर्थशास्त्र की शुरुआत की । भारतीय उपमहाद्वीप में महात्मा गांधी ने जमीनी स्तर की टेक्नोलॉजी पर जोर दिया और ग्राहक को सम्पूर्ण व्यावसायिक गतिविधि के । कन्द्र बिन्दु में रखा । जे . आर . डी . टाटा प्रगति की ओर ले जाने वाला बुनियादी ढाँचा लेकर आए । डॉ . होमी । जहाँगीर भाभा और प्रो . विक्रम साराभाई ने परमाणु ऊर्जा पर आधारित उच्च टेक्नोलॉजी एवं अंतरिक्ष कार्यक्रमों की शुरुआत की और साथ ही सम्पूर्णता व प्रवाह के प्राकृतिक नियमों पर स्पष्ट जोर दिया । डॉ . भाभा एवं प्रो . साराभाई के विकासात्मक दर्शन को आगे बढ़ाते हुए डॉ . एम . एम . स्वामीनाथन ने भारत रखना में हरित क्रान्ति लाने के लिए एकता के एक और प्राकृतिक सिद्धान्त पर काम किया ।

 डॉ . वर्गीज कुरियन । ने सहकारिता आन्दोलन को सशक्त बनाकर डेयरी उद्योग में एक नई क्रान्ति ला दी । प्रो . सतीश धवन के पारस्या की कोशिश की ने अंतरिक्ष में मिशन प्रबंधन की अवधारणाओं को विकसित किया । आई . जी . एम . डी . पी . में मैंने अतरिक्ष शोध में डॉ . ब्रह्मप्रकाश द्वारा स्थापित उच्च टेक्नोलॉजी को । अनुकूल बनाते हुए प्रो , साराभाई की दृष्टि और प्रो . धवन के मिशन को शामिल करने की कोशिश की । लेकिन सहाद भारतीय निर्देशित मिसाइल कार्यक्रम में अंतर्निहितता के प्राकृतिक नियम को भी जोड़ने की कोशिश की पहुंच गए ? अप जिससे टेक्नोलॉजी प्रबंधन की सम्पूर्ण स्वदेशी किस्में विकसित हो सके । की है । मुझे उ तकनीकी प्रबंधन का वृक्ष तभी फैलता है जब सकल रूप में जरूरतों , नवीनीकरण , अंतर्निर्भरता । ही यह होगी । और प्राकृतिक प्रवाह का स्व कार्यान्वयन होता है ।


 विकास के प्रतिरूप ही विकास की प्रक्रिया के लक्षण पदोन्नति , एक होते हैं , जिनका मतलब यह होता है कि चीजें धीमें परिवर्तन और अचानक रूपांतरण के मिले - जुले रूप जैसे अंतहीन में चलती हैं । हर रूपांतरण या तो एक नई छलॉग को जन्म देता है जिससे सोच , ज्ञान अथवा क्षमता के इन ' लिए और विकसित पटल का प्रादुर्भाव होता है या फिर पुराने किसी पटल पर जा गिरता है । अच्छा आपको रीति प्रबंध ऊपर उठने तथा पीछे गिरने की प्रक्रिया को इस प्रकार अनवरत जारी रखता है कि ऊपर उठने की नौजवान को आवृत्ति और उसका तात्त्विक आकार पीछे गिरने की अपरिहार्यता को सदा न सिर्फ सम्भाले रहे बल्कि । अर्जित करने निरस्त भी करता चले । कर देना चा पेड़ का तना एक आणविक ढाँचे की तरह होता है , जिसमें सभी क्रियाएँ रचनात्मक होती है , सभी छटपटाते सं नीतियों आदर्शी होती हैं और सभी फैसले समकलनात्मक होते हैं । इस पेड़ की शाखाएँ संसाधन । सम्पत्तियों , संचालन और उत्पादन होते हैं , जो कि तने द्वारा विकसित की गयी निरन्तर प्रक्रिया से पोषित । किये जाते हैं ।

जब सन् 1983 में आई . जी . एम . डी . पी . को मंजूरी मिली थी तब हमारे पास पर्याप्त तकनीक आधार नहीं था । बहुत घोडे से विशेषज्ञ उपलब्ध थे , लेकिन विशेषज्ञ टेक्नोलॉजी इस्तेमाल कर पान सामर्थ्य भी नहीं था । कार्यक्रम के इस बहु परियोजना वातावरण ने एक चुनौती पेश की थी - एक पाँच मिसाइल प्रणालियों विकसित करने की चुनौती । इसमे हमें संसाधनों की विवेचित भागाचा प्राथमिकताएं स्थापित करने और प्रगतिशील मानव शक्ति को लगाने की जरूरत थी । आखिर आई . जी . एम . डी . पी . में अठहत्तर भागीदार थे । इनमें छत्तीस टेक्नोलॉजी केन्द्र और सार्वजनिक पास में कुछ ' को जह  सालीस से ज्यादा उत्पादन केन्द्र , आयुध कारखाने , निजी कारखाने और व्यावसायिक संस्थान शामिल है । इसके अलावा सरकार में एक अलग से नौकरशाही तन्त्र था । कार्यक्रम के प्रबंधन में हमने अपनी विशिष्ट जरूरतों एवं क्षमताओं के लिए एक उपयुक्त मॉडल विकसित करने की कोशिश की थी ।

 हमने उन विचारों को भी लिया जो दूसरी जगह सामने आये थे लेकिन उन पर अमल अपनी सामर्थ्य को देखते पए ही किया । इस तरह हमारे समुचित प्रबंधन और सहकारिता उद्यम की कोशिशों ने उस प्रतिभा एव । वामता को प्रदर्शित करने में मदद की जो हमारी प्रयोगशालाओं , सरकारी संस्थानों तथा निजी उद्योगों में FFEE की EER आई . जी . एम . डी . पी . का तकनीकी प्रबंधन दर्शन मिसाइल विकास के लिए ही विशेष नहीं है । यह सफलता एवं ज्ञान के उस राष्ट्रीय अनुरोध को प्रदर्शित करता है कि अब दुनिया फिर कभी भी बाहुबल या पैसे की ताकत से नहीं चलेगी । वास्तव में ये दोनों ही शक्तियों का प्रवाह टेक्नोलॉजी की विशिष्टता के कारण होता है । सिर्फ टेक्नोलॉजी - सम्पन्न राष्ट्र ही स्वतन्त्रता एवं सम्प्रभुता का आनन्द लेंगे । टेक्नोलॉजी सिर्फ टेक्नोलॉजी का ही आदर करती है और जैसा कि मैंने शुरू में कहा है कि टेक्नोलॉजी विज्ञान से भिन्न एक सामूहिक गतिविधि है । यह किसी एक व्यक्ति की बुद्धि से नहीं बल्कि एक - दूसरे के पारस्परिक बौद्धिक संगम का परिणाम होता है - और यह वही है जो मैने आई . जी . एम . डी . पी . में बनाने की कोशिश की , अठहत्तर भारतीय संस्थानों का एक ऐसा परिवार , जो मिसाइल प्रणालियां भी बनाता है । हमारे वैज्ञानिकों के जीवन और सुख - दुःख को लेकर काफी अटकलें लगाई जाती रही है ।

 लेकिन सही ढंग से यह पता लगाने की कोशिश नहीं की गई कि वे कहाँ जाना चाहते थे और यहाँ कैसे पहुंच गए ? अपने जीवन के संघर्ष की कहानी बताते हुए मैंने अंदर कहीं - कहीं कुछ झलक देने की कोशिश की है । मुझे आशा है कि हमारे समाज में सत्तावाद के खिलाफ खड़े कुछ थोडे से नौजवानों के समान ही यह होगी । इस सत्तावाद का एक प्रमुख लक्षण यह है कि यह लोगों को दौलत , सम्मान , प्रतिष्ठा , पदोन्नति , एक - दूसरे की जीवन - शैली से प्रभावित रहने , आयोजित सम्मान - सभी तरह के प्रतिष्ठा द्योतक जैसे अंतहीन रास्ते पर ले जाता है । इन लक्ष्यों को आसानी से हासिल करने के लिए वे शिष्टाचार के नियमो को सीखते हैं और अपने आपको रीति - रिवाजों , परम्पराओं , आचार संहिता और इसी तरह की दूसरी चीजों में ढालते हैं । आज के नौजवान को जीवन - शैली को स्व पराजय की ओर ले जाने वाले इन रास्तों से बचना चाहिए । भौतिकता अर्जित करने के लिए कार्य करने की संस्कृति और उससे मिलने वाले प्रतिफल को अपने जीवन से अलग कर देना चाहिए । जब मैं अमीर , सत्ता - सम्पन्न शिक्षित लोगों को अपने भीतर शांति के लिए तड़पते . छटपटाते . संघर्ष करते देखता हूँ तो अहमद जलालुद्दीन और अयादुरै सोलोमन जैसे लोग याद आते हैं । पास में कुछ भी नहीं होते हुए वे कितने खुश थे । '


कोरमंडल के तट पर ।
 जहाँ के शंख नाद करते हैं .
 रेत के कण प्रकाश भरते हैं । 
रही हैं वहाँ कुछ शाही शख्सियतें 
जिनकी सल्तनत सागर - सी अपार थी
 जिनकी संपदा रेत - सी अमोल थी 
एक सूत धोती थी , एक आधी धोती थी 
 एक आधी मोमबत्ती 
 । एक हत्था टूटा प्याला
 , एक नीची दुछत्ती ।

      बहुत सी चीजों पर निर्भर रहे बिना भी वे अपने को कितना सुरक्षित महसूस करते रहे हर तो यह मा मानना है कि उन्होंने अपने भीतर से ही इसका संपोषण कर लिया होगा । वे अपने भीतरी संकेतों पर कहानी है . निर्भर रहे और बाहरी संकेतों पर बहुत ही कम , जिनका मैं ऊपर जिक्र कर चुका हूँ । क्या आप इन भी छोड़ा । यह संकेतों से परिचित है ? क्या आपका इन पर विश्वास है ? क्या आपके जीवन का नियंत्रण आपके और शिव सुब्रह्म हाथों में है ? इसे आप मुझसे लीजिए और बाहरी दबावों को दूर करने के लिए और फैसले लीजिए । पनदलाई आपका जीवन अच्छा बनेगा और आपका समाज अच्छा होगा ।

 अंतनिदेशित और मजबूत लोगों को अप . और प्रो . स नेता बनाने से सम्पूर्ण राष्ट्र का हित होगा । में विलक्षण जीवन में आप अपने स्वयं के भीतरी संसाधनों के निवेश की इच्छा रखिए , खासकर अपनी ही खत्म ह कल्पना की । यही आपको निश्चित रूप से सफलता दिलाएगी । जब आप स्वयं अपनी इच्छा एवं ऐतिहासिक जिम्मेदारी से कोई काम अपने हाथ में लेते हैं तो आप एक इंसान बन जाएंगे । नहीं ।

आप , मैं और प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर ने यहां अपनी - अपनी सृजनात्मक क्षमता से सब का बनाने और स्वचेतन के साथ शांति से रहने के लिए भेजा है । हम अपने - अपने रास्ते अलग चुनते हैं और अपनी - अपनी नियति तय करते हैं । जीवन एक कठिनाइयों भरा खेल है । इसमें आप सिर्फ तभी जीत सकते हैं जब आप एक व्यक्ति होने का जन्मसिद्ध अधिकार हासिल कर लें । इसे प्राप्त करने के लिए आपको सामाजिक या बाहरी खतरे उठाने को तैयार रहना होगा । सुब्रह्मण्यम अय्यर द्वारा मुझे अपनी रसोई में भोजन के लिए आमंत्रित करने को आप क्या कहेंगे ? मुझे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने के लिए मेरी बहन जोहरा ने अपनी सोने की चूड़ियों व हार गिरवी रखा था , इसे आप क्या कहेंगे ? प्रो . . स्पांडर इत्त पर जोर देते रहे कि मुझे उनके साथ आगे की पंक्ति में बैठकर फोटो खिंचवाना होगा . इसे क्या कहा जाए ? क्या मोटर गैराज में हॉवरक्राफ्ट का निर्माण नहीं हुआ था ? सुधाकर का साहस , डॉ . ब्रह्मप्रकाश का सहयोग , नारायणन का प्रबंधन , वेंकटरमण की दृष्टि , अरुणाचलम् की गतिशीलता - हरेक व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति एवं प्रेरणा का उदाहरण है । में कोई दार्शनिक नहीं हूँ । मैं तो सिर्फ टेक्नोलॉजी का एक व्यक्ति हूँ । मैंने अपना सारा जीवन । मेरी इस रॉकेट विज्ञान को सीखने में लगाया है । लेकिन मैंने विभिन्न संगठनों में बहुत सारे भिन्न - भिन्न प्रकार है , जो सि लोगों के साथ काम किया है । इसी जटिलता से मुझे व्यावसायिक जीवन की घटनाओं को समझने का । अवसर मिला । अब जब मैं पीछे की ओर देखता हूँ , जोकि अब तक मैंने बताया है , तो मुझे लगता है कि यह सब मेरे स्वयं के विचार - प्रेक्षणों एवं निष्कर्षों से ज्यादा कछ नहीं है । मेरे सहकर्मी , साथी , नेता , नाटक का असली पात्र मैं खुद , रॉकेट का जटिल विज्ञान , तकनीकी प्रबंधन के महत्वपूर्ण मसले आदि सभी आरत रूप में नजर आते हैं । पीड़ा एवं खुशी , उपलब्धियों और असफलताएँ - जो सन्दर्भ , समय व काल भिन्न - भिन्न हैं - सब एक साथ नजर आती हैं । जब आप हवाई जहाज से नीचे देखते हैं तो लोग , मकान , चट्टानें , खेत . पेड़ - सभा गड्ड - मड्ड नजर आते हैं और इनमें फर्क कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है ।


 " मेरे भ्रम , मेरा मूल्य
 मेरी महानता , मेरा रश्क । 
मेरी कुव्वत से परे कितना तू ?
मुझमें तेरा ही तो अक्स !

 ' यह कहानी पहले ' अग्नि ' प्रक्षेपण तक की ही है । तब से अब तक और बहुत कुछ हुआ है . हो रहा है . होता रहेगा । जीवन चलता रहेगा । अगर हम सौ करोड़ लोगों की संयुक्त क्षमता के रूप में सोचें तो यह महान् देश हर क्षेत्र में महान उपलब्धियाँ हासिल करेगा । मेरी कहानी जैनुलाबदीन के बेटे की कहानी है , जो रामेश्वरम् की मसजिद वाली गली में सौ साल से ज्यादा तक रहे और यहीं अपना शरीर छोड़ा । यह उस किशोर की कहानी है . जिसने अपने भाई की मदद के लिए अखबार बेचे । यह कहानी शिव सुब्रह्मण्यम अय्यर एवं आयादुरै सोलोमन के शिष्य की कहानी है । यह उस छात्र की कहानी है जिसे पनदलाई जैसे शिक्षकों ने पढ़ाया । यह उस इंजीनियर की कहानी है जिसे एम . जी . के . मेनन ने उठाया और प्रो . साराभाई जैसी हस्ती ने तैयार किया ; और एक ऐसे कार्यदल नेता की कहानी , जिसे बड़ी संख्या में विलक्षण व समर्पित वैज्ञानिकों का समर्थन मिलता रहा । यह छोटी - सी एक कहानी मेरे जीवन के साथ ही खत्म हो जाएगी । मेरे पास न धन , न सम्पत्ति , न मैने कुछ इकट्ठा किया . कुछ नहीं बनाया है जो ऐतिहासिक हो , शानदार हो , आलीशान हो । पास में भी कुछ नहीं रखा है - कोई परिवार नहीं , बेटा - बेटी जिए । इससे को अपना कर अपनी इच्छा एवं से सब कुछ नहीं । '


 मैं इस महान पुण्यभूमि में
 नते हैं और खोदा गया एक कुआँ ।
 तभी जीत देखू अगिनत बच्चे
 रने के लिए खींचते पानी , मुझमें जो भरा 
अपनी रसोई कृपा की उस परवरदिगार का ।
 के लिए मेरी और सींचते फूल , पौधे , फसलें 
 नया दौर 
 नई नस्लें
 प्रकाश का दूर - दूर तक नियामत
  मेरे खुदा की ।


         मैं नहीं चाहता कि मैं दूसरों के लिए कोई उदाहरण बनें । लेकिन मुझे विश्वास है कि कुछ लोग सारा जीवन - मेरी इस कहानी से प्रेरणा जरूर ले सकते हैं और जीवन में सन्तुलन लाकर वह संतोष प्राप्त कर सकते है , जो सिर्फ आत्मा के जीवन में ही पाया जा सकता है । मेरे परदादा अबुल , मेरे दादा पाकीर और मेरे पिता जैनुलआबदीन की पीढ़ी अब्दुल कलाम के साथ खत्म होती है लेकिन उस सार्वभौम ईश्वर की कपा इस पुण्यभूमि पर कभी खत्म नहीं होगी , क्योंकि वह तो शाश्वत है । ।

शब्दावली 




1 . आई . जी . एम . डी . पी - इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डवलपमेन्ट प्रोग्राम 
2 इसरो - इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन ( भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ) । 
3-वी . एस . एस . सी - विक्रम साराभाई स्पेस सेन्टर ( विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र ) । एस . एल . वी -
 4- : - सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल ( उपग्रह प्रक्षेपण यान )
 5 . डी . आर . डी . ओ - डिफेंस रिसर्च एण्ड डवलपमेंट ऑरगेनाइजेशन ( रक्षा अनुसंधान तथा विकास सभी एक में संगठन )



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