कबीर प्रथम अध्याय 11 कक्षा सार


Wednesday, 9 October 2019



कबीर प्रथम अध्याय 11 कक्षा सार



कवि - परिचय



                      कबीर ज्ञानमागी शाखा के सर्वप्रमुख एक महान संत , समाज - सुधारक और क्रांतदर्शी कवि है । सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है । कबीर का जन्म विक्रम संवत 1455 के आसपास काशी एक किंवदन्ती के अनुसार किसी विधवा ब्राह्मणी की कोख से इनका जन्म हुआ जिसने लोकलाज भय से नवजात शिशु को लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया इनका पालन - पोषण निःसंतानजुलाहा दम्पत्ती नीरू और नीमा ने किया । बचपन से ही कबीर एकान्तप्रिय , चिन्तनशील और साधुसेवी स्वभाव के थे । उन्होंने जो कछ सीखा , अनुभव की पाठशाला से सीखा । वरना कहा तो यह जाता है कि - मसि कागद एयो नहीं , कलम गहि नहीं हाथ । सत्गुरू रामानन्द की कृपा से उन्हें आत्मज्ञान और प्रभु - भक्ति का अमृतत्व प्राप्त हुआ । कबीर आत्मिक उपासना अर्थात् मन की पूजा पर विश्वास करते थे ।
मध्यकाल के क्रान्तिपुरूष होने के कारण इन्होंने समाज के भीतर और बाहरी दोनों पक्षों पर तीखा व्यंग्यबाण कसा । वे हिन्दू और मुसलमान दोनों को एक ही पिता की संतान स्वीकार करते थे । इन्होंने व्रत . रोजा , नमाज आदि बाह्य विधि - विधानों । का कड़े शब्दों में खण्डन किया । उनका मानना है कि हम सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं । अतः हमें सदैव प्रेम - तत्त्व का निर्वाह करना चाहिए ।

उनका कथन है 

''कहे कबीर प्रेम नहीं उपज्यो , बांध्यो जमपुरि जासी । ''



पाठ - परिचय -


          कबीर ने गुरु को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है । वे गुरु को संसार में सबसे बड़ा सगा सम्बन्धी मानते थे । गुरु को मनुष्य का मार्गदर्शक , सबसे बड़ा शुभचिन्तक माना है । कबीर ने स्पष्ट किया है कि गुरू मानव को सदमार्ग दिखाकर साधना की ओर प्रवृत्त करता है । संसार की नश्वरता पर कबीर जोर देते हैं । अज्ञानी गुरु और अज्ञानी शिष्य दोनों अज्ञानतारूपी अन्धे कूप में गिर जाते हैं । प्रमु का नाम स्मरण करने से अहंकार का विनाश हो जाता है और जीव ब्रह्ममय हो जाता है । कबीर ने निराकार ब्रह्म को सर्वस्व मानकर उसमें लौ लगाने में ही जीवन की सार्थकता सिद्ध की है । ब्रह्म का अस्तित्व , प्रेम , काम - क्रोध आदि की निन्दा . ईश्वर की एकता , जीव और ब्रह्म की एकता पर बल दिया है । प्रस्तुत दोहों । में कबीर का साधनात्मक भाव भी दिखाई देता है ।



गुरु महिमा 

सतगुरु की महिमा अनंत , अनंत किया उपगार ।
 लोचन अनंत उगाडिया , अनंत दिखावण हार ।


 सतगुरु साँचा सूरियों , सबद जु बाह्या एक ।
  लागत ही में मिलि गया , पड्या कलेज छेक । । ( 2 )

 चीसठि दीवा जोइ करि , चौदह चन्दा मांहि ।
 तिहिं परि किसको चानिणी , जिहि घरि गोविंद नाहि । । ( 3 ) 

थापणि पाई थिति भई , सतगुरु दीन्हीं धीर ।
 कबीर हीरा बणजिया , मानसरोवर तीर । । ( 4 ) 

पासा पकड़ा प्रेम का , सारी किया शरीर । 
सतगुरु दाव बनाइया , खेले दास कबीर । । ( 5 )

 माया दीपक नर पतंग भ्रमि भ्रमि इव पडत ।
 कहै कबीर गुर ग्यान थे . एक आध उबरंत । । ( 6 )

 कोटि कर्म पल मैं करै यह मन विषिया स्वादि ।
 सतगुरु सबद न मानई , जनम गवायो बादि । । ( 7 ) 


गुरु गुरु में भेद है , गुरु गुरु में भाव ।
 सोई गुरु नित बन्दिये , जो शब्द बतावे दाव । । ( 8 )


 गुरु बिन माला फेरते , गुरु बिन देते दान । 
गुरु बिन सब निष्फल गया , जा पूछो वेद पुरान । । ( ७ ) 

कोटिन चन्दा ऊगवे , सूरज कोटि हजार ।
 सतगुरु मिलिया बाहरा , दीसे घोर अंधार । । ( 10 ) 

ऐसे तो सतगुरु मिले , जिनसे रहिये लाग । 
सबही जग शीतल भया , जब मिटी आपनी आग । । ( 11 )

यह तन विष की बेलरी , गुरु अमृत की खान ।
 सीस दिये जो गुरु मिलें , तो भी सस्ता जान । । ( 12 ) 

 गुरु से ज्ञान जो लीजिए , सीस दीजिए दान । 
बहु तक भोंदू बह गये , राख जीव अभिमान । । ( 13 ) 


कबी गुरु समान दाता नहीं , जाचक शिष्य समान । 
चार लोक की संपदा , सो गुरु दीन्हीं दान । । ( 14 )

 सतनाम के पटतरे , देवे को कछु नाहिं ।
 क्या ले गुरु संतोषिये , हाँस रही मन माहि । । ( 15 )



दोहे

मन मथुरा दिल द्वारिका काया कासी जाणि । 
दसवां द्वारा देहुरा तामै जोति पिछाणि । । ( 6 )

 जब मैं था तब हरि नहिं अब हरि है मैं नौहि ।
 सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माहि । । ( 2 ) 

सातो सबद जु बाजते , घरि घरि होते राग ।
 ते मन्दिर खाली पड़े , बेसण लागे काग । । ( 3 ) 


आषड़िया झाई पड़ी पंथ निहारि निहारि । 
जीभड़िया छाला पड़या राम पुकारि पुकारि । । ( 4 )

 पाणी ही तें हिम भया , हिम हवै गया बिलाइ । 
जो कुछ था सोइ भया , अब कछू कह्या न जाइ । । ( 5 )



 शब्दार्थ

  •  उपगार - उपकार ,
  •  सूरिवा - सूरमाँ ,
  • थिति - स्थायित्व , 
  • उबरंत - उबरना , 
  • गुरु - भारी , 
  • भोंदू - मूर्ख , 
  • संपदा - धन वैभव , 
  • हाँस - इच्छा ।
  •  लोचन - नेत्र , 
  • चानिणी - उजाला ,
  •  पासा - गोटी , 
  • विषिया - भोगादि , 
  • कोटि - करोड़ , 
  • अभिमान - घमण्ड ,
  •  जाचक - याचक .
  •  साँचा - वास्तविक 
  • थापणि - स्थापना .
  •  माया - सांसारिकता . 
  • गुरू - ज्ञान प्रदान करने वाला , 
  • सीस - सिर 
  • दाता - देने वाला , 
  • पटतरे - बदले में , 


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