हमारी काश्मीर यात्रा कक्षा 11 सारांश


Wednesday, 23 October 2019




हमारी काश्मीर यात्रा कक्षा 11 सारांश 



                                                                                                       - गणपति चन्द्र भंडारी 


लेखाक - परिचय


हमारी काश्मीर यात्रा 





                                 राजस्थान साहित्य अकादमी के मानद सदस्य श्री गणपतिचन्द्र भण्डारी राजस्थान के अत्यन्त पठानका लोकप्रिय कवि हैं । रक्त - दीप आपकी कविताओं का संग्रह हा श्री भंडारी अनेक सामाजिक , साहित्यिक एवं शिक्षण संस्थाओं को प्राण हैं और इनके संरक्षण एवं निर्देशन में उन्होंने प्रगति के मार्ग को प्रशस्त पान है । भंडारी जी का सजग व्यक्तित्व कवि , पर्यटक , निबंधकार आलोचक तथा अध्यापक का सुन्दर समन्वय है । व्यंग्य एवं हास्य इनकी रचनाओं के पाथेय है ; शिष्ट हास्य के फव्वारे ' परीक्षक के प्रति ' , ' बेवकम कौन ? ' तथा भगवान से भेंट आदि निबन्धों में छूटते दृष्टिगत होते हैं ।
आपकी लेखनी में प्रसादात्मकता एवं सरसता है । भाषा की स्वच्छता , विचारों की स्पष्टता , वाक्यविधान की सरलता एवं अभिव्यंजना की सुबोधता इनकी शैली के गुण हैं । सरल . निष्कपट . निरावरण व्यक्तित्व श्री भंडारी जी की कविताओं एवं निबन्धों में बोलता है । आपके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा गुण है - आत्मीयता । निज को उपस्थित करना यदि निबन्ध का बहुत बड़ा आकर्षण है तो भंडारी जी में वह प्रचुर मात्रा में है । प्राध्यापक होने के नाते विषय | और विशाल डाव के विश्लेषण की ओर आपकी रूचि अधिक है ।

पाठ  - परिचय 

                         यहीं श्रेणियों को पार प्रस्तुत यात्रा वृतान्त में गणपति चन्द्र भण्डारी द्वारा जोधपुर से काश्मीर की रोवर स्काउटों के साथ तल से की गयी यात्रा का जीवंत , सरस तथा काव्य युक्त वर्णन है । एक बार हम लेखक के साथ काश्मीर की । वादियों की ओर बढ़ते हैं तो फिर पूरी शब्द यात्रा किये बिना रुकने का मन ही नहीं करता । काश्मीर यात्रा । गुरु शिखर के व में स्थान - स्थान पर चाहे काश्मीर घाटी हो या जम्मू या श्रीनगर के देवोपम पर्वतीय दृश्य बड़े ही । एक डाक बंगला मनोहारी - अलौकिक , सुरम्य तथा मनभावन लगते हैं । भण्डारी जी की लेखनी से सृजित अनुभूति परक । हों कमरे कच प्रविष्ट हुए । दूर में छिपा जम्मू ना पुत्र को छिपाये ए पाद - पदम जम्मू यात्रा वृत्त निस्संदेह पठनीय तथा हृदयंगम करने योग्य है ।

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वृष राशि का सूर्य जब अपने पूर्ण यौवन - काल का प्रखर तेज इस पृथ्वी पर उड़ेल और अपनी कोटि - कोटि भुजाएँ फैलाकर धरा - वधू के रोम - रोम का आलिंगन करने लगता के निवासियों को महाकवि बिहारी की यह उक्ति चरितार्थ होती हई सी प्रतीत होती है कहलाने एकत बसत , अहि मयूर मृग बाघ । जब ह थी । शीतल सर्म डिला - हिलाकर संगीत से मनुष्य मील की दूरी प लक्ष्मण झूले के सज इस पृथ्वी पर उड़ेलने लगता है लिगन करने लगता है तो मरुभूमि लगता है


भंडारी जब निदाघ के दीर्घ दाघ से संतप्त पवन भी " घरि एक वैठि कहूँ धामै वितवत है " का अनुसरण करने लगता है तो मरुधरा के सैलानियों का मन उड़ - उड़कर काश्मीर की शीतल बर्फीली क्रोड़ में कुलाचे भरने लगे तो क्या आश्चर्य र ऐसे ही भीषण ग्रीष्मकाल में एक दिन अपने कछ रोवर स्काउटों के साथ । मैं जोधपुर से काश्मीर के लिये रवाना हुआ । दो दिनों की भीड़ - भरी रेल यात्रा के उपरान्त हमारा दल दिल्ली . अमृतसर होता हुआ पठानकोट पहुँचा । यहाँ से श्रीनगर तक 290 मील की यात्रा मोटरबस द्वारा करनी पड़ती है । हमने आधा किराया । अग्रिम भेजकर पहिले से ही स्थान आरक्षित करवा लिया था . इसलिये स्टेशन के समीपस्थ टूरिस्ट ब्यूरो । के कार्यालय से सम्पर्क स्थापित करते ही हमें अपनी बस बता दी गई । एक दिन में ही श्रीनगर पहुंचने की इच्छा वाले यात्रियों को प्रातः 9 बजे तक पठानकोट से चल देना पड़ता है , पर हम तो वहां पहुंचे ही । अत्यन्त ही 1 बजे थे । अतएव मार्ग में विश्राम करने का निश्चय करके आराम से 2 बजे रवाना हुए ।



साहित्यिक पठानकोट से जम्मू तक 69 मील का सीधा मार्ग है । पर्वत प्रदेश जम्मू के आगे से आरम्भ होता । शस्त पाया है । पठानकोट से निकलते ही हम रावी नदी की नहर के किनारे - किनारे चलते हुए माधोपुर पहुंचे जहाँ दर समन्वय से यह नहर निकलती है और फिर टावी नदी के पुल को पार करके पाँच बजे के लगभग जम्मू शहर में । ' बेवकूफ । प्रविष्ट हुए । दूर से ही रावी की बहन टावी नदी के उस पार पर्वत - राज हिमाचल की प्रथम श्रेणी के क्रोड़ दात्मकता में छिपा जम्मू नगर ऐसा सुन्दर दिखाई दिया , मानो स्वयं गिरिराज - कुमारी अपने हरे - भरे अंचल में अपने | पुत्र को छिपाये हुए किसी गूढ विचार - धारा में निमग्न बैठी हो और टावी की जलधारा उसके लटकते वेताओं एवं हुए पाद - पदम से कल्लोले कर रही हो । करना यदि - जम्मू नगर पर्वत के ढाल पर बसा हुआ है । संकड़े किन्तु स्वच्छ बाजार हैं . शानदार होटल हैं , और विशाल डाक बैंगला है जहाँ बस - स्टैंड भी है निकट ही रघुनाथ जी का प्रसिद्ध मन्दिर है ।
अधिकांश बस्ती हिन्दुओं की है और खाने - पीने की अच्छी सुविधा है । यहाँ कभी - कभी यात्रियों को मोटर बदलनी पड़ती है । यहीं से चढ़ाई आरम्भ होती है । हम 9 बजे संध्या को वहाँ से निकल कर हिमाचल की प्रारम्भिक श्रेणियों को पार करते हुए रात के साढ़े दस बजे के लगभग कुद नामक स्थान पर पहुंचे ।

                                      अब हम समुद्र तल से 5 , 900 फुट ऊँचाई पर थे । यह ऊँचाई लगभग राजस्थान के शीर्षस्थ अर्थद - गिरि की सर्वोच्च चोटी गुरु शिखर के बराबर ही थी , परन्तु ठंड यहाँ कुछ अधिक थी । कुद में चाय - पानी की कुछ दुकानें हैं और एक डाक बँगला भी . पर हमने एक दुकानदार से ही एक सस्ता कमरा किराये पर लेकर उसी में रात काटी । यहाँ कमरे कच्ची फर्श वाले और गन्दे हैं । न बिजली है न अन्य सुविधा , पर घर से भिन्न प्रकार का जीवन बिताने के लिये ही तो हम निकले थे । अतः प्रसन्नता से उसी कमरे में सिकुड़ कर लेट रहे । जब हम कुद से रवाना हुए तो प्राची के पर्वत - शृंगों पर अरुणा की गुलाबी मुसकान फूट पड़ी पाशीतल समीर तरुण वनस्पतियों को गुदगुदा कर जगाने लगा था और वे अपने कोमल कर - पल्लव व्यंजना की नाते विषय टों के साथ काश्मीर की श्मीर यात्रा व्य बड़े ही तुभूति परक ने लगता है तो मरुभूमि हला - हिलाकर मानो उसे बरज रही थीं । ऊँचे - ऊँचे पर्वतों की छाती को रौंदती हुई अपने एकरस कर्णकटु जगात से मनुष्य के श्रम का जयघोष करती हई हमारी बस सर्पाकार सड़क पर चली जा रही थी । 21 ल की दूरी पर हमें रामवन की छावनी के समीप चिनाब की धारा पार करनी पड़ी । इस पर बना पुल झूले के ढंग का है और उस पर सख्त पहरा रहता है । काश्मीर के सभी पुलों पर निरन्तर पहरा छ क्याकि यदि एकाध पुल भी जवाब दे दे या कोई शत्रु उसे विनष्ट कर दे तो काश्मीर का भारत सम्पर्क टूट जाय और सारा यातायात ठप्प हो जाय ।


उतर डाक बैंगला लते ही समत गरे अत्यन्त अ - ऊँचे श्वेत की थोडी के बीच से ' मुक्ताओं र अस्तु , द रामवन कछ नीचे स्थान पर आया हुआ है । यहाँ से पुनः हम चिनाब की एक धारा से औ खेलते हुए निरन्तर ऊपर चढ़ने लगे । कभी धारा दाई ओर कभी बांई ओर । कभी एकदम खडडे मेंबर हई तो कभी ठीक हमारी मोटर के नीचे से निकल कर अठखेलियों करती हुई गहरी घाटियों में लप्ता मील की दरी पर स्थित बेनिहाल नामक स्थान से आगे बढ़ते ही चारों ओर भीमकाय पर्वत अपना गर्न मस्तक उठाये हमारा मार्ग रोकते से दिखाई दिये ।


 यहाँ से सुप्रसिद्ध पीरपंचाल पर्वत श्रेणी की आरम्भ होती है जिसके ठीक पीछे स्वर्गापम काश्मीर की सुरम्य घाटी है । छोटे - बड़े अनेक पर्वतों की लके खेता चोटियों हमारे चारों ओर कभी दायें और कभी बायें घूम - घूम कर घूमर सी लेती हुई दिखाई देती थीं और हम निरन्तर ऊपर चढ़ते जाते थे । एकाएक हमें समीपस्थ चोटियों पर कुछ श्वेत रेखाएँ सी दिखाई देने लगी - ऐसी , मानो किसी योगिराज के सिर की श्वेत जटाएँ इधर - उधर बिखर रही हों अथवा श्वेत मक्तायो के चूर्ण से किसी ने इन गिरिबालाओं की माँग सँवार दी हो । जब मोटर के सहयात्रियों ने यह बतायापार के विशाद उतरे । एक ब कि यह बर्फ है तो हमें एकाएक विश्वास नहीं हुआ क्योकि श्रीनगर पहुंचने के पहले ही हिमरेखाओं से सुसज्जित शिखरों के दर्शन होने की हमने कभी कल्पना न की थी ।


 इस एक ही पर्वत श्रेणी पर हम 8 - 185फिल्मी संगीन फीट की ऊंचाई तक चढ़ चुके थे । देवदार और चीड़ के दीर्घकाय वृक्ष हमारा साथ छोड़ चुके थे । इस होटल में न पर्वत का ऊपरी भाग ठीक जोधपुर के पहाड़ों जैसा ही नग्न और वनस्पतिहीन है । एक ओर ऊँचा पहाडया । ये हाउन तो दूसरी ओर भीषण खाई ! सँकडी सी सड़क और मोटरों , बसों और ट्रकों का सर्राटे के साथ इंच - इच श्रीनगर भर की छेटी से निकल जाना ! मोटर - चालकों के साहस , कौशल व उनकी सतर्कता की दाद देनी पड़ती काट कर निन है । उनकी तनिक सी असावधानी से यदि खाई की ओर बस लुढ़क जाय तो न उसके पुर्जे ही हाथ लगे निकलती हैं । न यात्रियों की अस्थियों ही । इसी स्थान पर बेनिहाल दर्रा ( सुरंग ) है जिसे पार करने पर काश्मीर की सुरम्य झेलम को डक घाटी के दर्शन होने लगते हैं । यहाँ यातायात का कठोरता से नियंत्रण किया जाता है और एक समय में जिससे नावों सुरंग में एक ओर की मोटरों को ही प्रविष्ट किया जाता है ।


                                                       जून मास में भी इस सुरंग के आसपास हमें हुए है जिन्हें । बर्फ बिखरी मिली तो दिसम्बर की तो बात ही क्या ? उस समय इस पर्वत का सारा मार्ग हिमाच्छादित कुल तीन प्रक हो जाता है और सुरंग का द्वार बर्फ से पट जाता है । इसलिए भारत सरकार ने इसी पहाड़ को 9 . 500 धाओं से सर फीट की ऊंचाई पर ही बेध कर नया मार्ग बनाया है जिससे कि घोर हेमन्त काल में भी काश्मीर घाटी - किराया उस का मार्ग चालू रह सके । यह नई सुरंग तैयार हो चुकी है और आजकल यही मार्ग काम में लिया जाता ज्यधारा में अ है । पास में एक और सुरंग खोदी जा रही है जिसके तैयार हो जाने पर एक मार्ग आने वाली गाड़ियों से आने - जा के लिये और दूसरा मार्ग जाने वाली गाड़ियों के लिए काम आयेगा । तब निश्चित समय पर ही वहाँ पहुँचना परों से अल आवश्यक नहीं रहेगा ।
 पुरानी सुरंग केवल 640 फीट लम्बी थी और इससे पीरपंचाल पर्वत - श्रेणी पर चढ़ाई - उतराई के मार्ग में लगभग 17 - 18 मील की कटौती हो गई है , जिससे मार्ग का खतरा भी मिट झील में से सा गया है । छोटी होती सुरंग से पार होते ही आस - पास की सारी पर्वत - श्रेणियाँ लप्त हो गई मानो विश्व भर के मान न कमरे व एक गौरव और महत्त्व के प्रतिनिधियों की जो सभा जुड़ी हुई थी वह समाप्त हो गई हो और इस शिखरदार और सकती हैं । सम्मेलन के वे सारे सदस्य अपने - अपने देशों को लौट चले हों । ऐसा लगा मानो हम किसी रजत - कमान वाले अमृत - कुण्ड के एक किनारे खड़े हों और धीरे - धीरे उस कण्ड में अमतपान के लिये उतरते जा हो । दूर - दूर पर चारों ओर हिमाच्छादित शिखरों से घिरी हुई एक विशालकाय रजत - कटार - सा काश्मीर की उपत्यका सचमुच धरती पर स्वर्ग है ! न जाने क्या समझ कर मुगल बादशाह शाह प्रकृति के इस स्वाभाविक श्रृंगार की उपेक्षा कर , उसी के द्वारा प्रदान किये गये जड़ सगमर पाषाण - खण्डों से मानव द्वारा निर्मित दीवान - ए - खास पर " गर फिरदौस बर रूए " वाला वाक्य लिखवा कराचार्य का R . गब्बे , नगी अनेक वस्तु शेन - कक्ष में शंकरा पाला वाक्य लिखवाया था ?




आँखमिचौनी ड्डे में बहती में लप्ता सक 4 डाक बंगला भी है । यहाँ से जना गर्वोन्नत की चदाइ क पर्वतों की देती थीं और हरे को पार करने के बाद हम पुनः लगभग 5 . 000 फीट की ऊँचाई वाली काश्मीर की सुरम्य वर आए । मध्याह्न होते - होते हम काजीकुण्ड पहुंच गए जहाँ कुछ जलपान गृह भी है और त्याला भी है । यहाँ से भोजनोपरांत हमने श्रीनगर की ओर प्रस्थान किया । काजीकुण्ड से मतल भूमि पर बनी हुई सड़क के दोनों किनारों पर सफेदे के सीधे और ऊँचे वृक्षों की लम्बी आकर्षक लग रही थीं ; जैसे यात्रियों के स्वागतार्थ प्रकृति ने घाटी के प्रवेश - मार्ग पर त खम्भों पर हरी - हरी पताकाएँ टॉग रखी हो ।

 आगे बढ़ने पर जल से भरे हुए छोटे - छोटे था औरत के खेतों में काम करते हुए कृषक दिखाई दिये । दिखाई दे बोडी - थोड़ी दूरी पर स्थित छोटे - छोटे गाँवों को पार करते हुए पामपुर के पास हम केसर के वत मुक्ताओं के बीच से निकले , परन्तु अभी फसल उतर चुकी थी और खेत खाली पड़े थे । फिर अखरोट और यह बताय विशालकाय छायादार वृक्षों के बीच होते हुए 5 बजे के लगभग हम श्रीनगर के मोटर अडडे उमरखाओं से तिरे । एक बार फिर वही तोंगों और मोटरों की चिल्ल - पो , राहगीरों की भीड़ - भाड़ और होटल - रेस्टोरेंटों र हम 8 . 18 किमी संगीत ! सरदी भी कुछ विशेष न थी । जीवन के इन अति परिचित दृश्यों से बचने के लिये चुक थे । इस होटल में ठहरने का विचार त्याग कर चिनारबाग में स्थित एक डॉगे ( नाव ) में ठहरने का निश्चय ऊचा पहाडया ये हाउस बोट ' या नावघर श्री नगर की एक प्रमुख विशेषता है । साथ इंच - इंच श्रीनगर झेलम नदी के दोनों ओर बसा है और उसके उत्तर - पूर्व में विशाल डल झील है ।

 झेलम द देनी पड़ती काट कर निकाली गई व उसी में पुनः मिला दी गई छोटी - बड़ी अनेक नहरें हैं जो शहर के बीच में ही हाथ लगे निकलती हैं और जल - मार्ग का काम देती हैं । चिनार बाग के निकट की ऐसी ही एक नहर डलगेट र की सुरम्य लम को डल झील से मिलाती है । डलगेट डल झील और झेलम के जल की सतह का नियंत्रण करता एक समय में जिससे नावों का झेलम से डल झील में आना - जाना सम्भव होता है । झेलम पर कुल 7 स्थानों पर पुल आसपास हमें हुए है जिन्हें काश्मीरी लोग " कादल ' कहते हैं । प्रथम पुल ' अमीर कादल विशेष महत्वपूर्ण है । श्रीनगर हिमाच्छादित कुल तीन प्रकार की नावें मिलती है ।


विशालकाय नावघर ( हाउस बोट ) जो आधुनिक जीवन की सभी ड को 9 , 500 विधाओं से सुसज्जित होते हैं और तीन सौ रुपये मासिक से हजार रूपये मासिक तक किराये वाले होते काश्मीर घाटी किराया उसकी विशालता , सुविधाओं व स्थिति पर निर्भर करता है । ये हाउस बोट प्रायः झेलम की लिया जाताव्य धारा में अथवा डलगेट से नेहरू पार्क तक डलझील में पड़े रहते हैं और अपना स्थान नहीं छोड़ते । वाली गाड़ियों नसे आने - जाने का सारा काम छोटी नुकीली डोंगियों द्वारा होता है जिन्हें शिकारा कहते हैं । इन - वहाँ पहुँचना वघरों से अलग भी सैंकड़ों शिकारे हैं जो खूब सजे सजाये होते हैं और संध्या के समय यात्रियों को ति - श्रेणी परल झील में सैर कराने के लिए ले जाते हैं । तीसरी प्रकार की नावे डोंगा ' कहलाती हैं जो नावघरों से उतरा भी मिटटी होती हैं ( लगभग 40 - 50 फीट लम्बी ) परन्तु उनमें सजावट नहीं होती ।


 लकड़ी की फर्श तथा कमरे व एक रसोई और कछ खला आँगन होता है । ये सस्ती मिल जाती है और जहाँ चाहो ले जाई भर के मान सकती है । हमने भी ऐसे ही एक डोंगे में डेरा डाला । डोंगों के मालिक सभी मुसलमान है जो प्राय मानदार और विश्वसनीय हैं और आप का सारा काम कर देते है । श्रीनगर में अनेक दर्शनीय स्थान हैं परन्त सबसे महत्वपूर्ण काश्मीरी कला - कृतियों का एम्पोरियम , प्राचार्य का मन्दिर और डल झील है । एम्पोरियम में काश्मीरी शालें , गलीचे , लकड़ी व बेत का सामान , र इस शिखर रजत - कगारों उतरते जा रहे टोरे - सी यह इशाहजहाँ ने य , नगीने , कूटे व धात की कलापूर्ण वस्तुएँ , शहद , केसर आदि अनेक प्रकार का सामान मिलता तक वस्तुए बड़ी मूल्यवान हैं जैसे शाल और गलीचे । दस हजार रूपये का गलीचा तो गलीचों के केशन - कक्ष में ही बिछा हुआ है ! संगमरमर के लखवाया था ? शकराचार्य का मन्दिर चिनारबाग के समीपस्थ एक पहाडी पर बना हुआ है



वैसे तो देवा भरनाथ , शेषना । साथ वायुवेग मानो हैं । पूर्व गोपादित्य के द्वारा बनवाया गया बताते हैं । इसमें एक विशाल शिवलिंग है और यह भारी भर प्रस्तर - खंडों से निर्मित है । इस मंदिर से श्रीनगर का व काश्मीर घाटी का दृश्य अत्यंत सुन्दर दिखाईनाथ , र से भरा है । घाटी के चारों ओर की सुदूरवर्ती पर्वत - श्रेणियों के नवनीत - धवल और ईषत - धवल शृंगों पर कीलों करते हुए मेघशावक और भीमकाय नीलवर्ण गिरिराजियों की उपत्यकाओं में तैरते हुए किसी विवाट का प्रा विधुरा यक्षिणी के संदेशवाहक मेघदूत राजस्थान की चिलचिलाती धूप में तपस्या करते हुए ताम्रवर्ण पर्वतासाथ वायुवा को देखने की अभ्यस्त आँखों के लिए एक ' अतीन्द्रिय कल्पनालोक का सृजन करने लगे ।


चंदन दक्षन वाली दुग्ध चारों ओर लिपटे हुए भुजगों की तरह देवदार , सफेदा , अखरोट और चिनार के वृक्षों की हरीतिमा निलिखित छप " उस अ परिवेष्ठित श्रीनगर के अंग - प्रत्यंगों से लिपटी वर्तुलाकार झेलम की रजत धारायें , सरस भावनाओं से पाई नगर के हृदय की अनुकृति डल झील और उसमें तैरने वाले हरे - भरे खेत , घर और नावघरों की पंक्तियों सभी कुछ अदभुत , अनिवर्धनीय था । डल झील के तट की पर्वतश्रेणियों के आँचल में अनेक दर्शनीय स्थान है जिनमें चश्मेशाही - शालीमार और निशात बाग बहुत प्रसिद्ध है । शालीमार और निशात बाग क्रमशः मुगल सम्राट जहाँगीर । अहि - स और नूरजहाँ के भ्राता आसफ अली के द्वारा बनवाये हुए हैं । दोनों उपवनों में एक कृत्रिम नाले के जल को अनेक स्थानों पर प्रपात के रूप में गिराया गया है और उसके प्रवाह के बीच - बीच में हौज और फव्वारे पाद - पदर है । इतवार को जब इस नाले का पानी खोला जाता है तो रंग बिरंगे फूलों की कतारों के बीच में कलकल वरज - इ निनाद करता हुआ जल का यह प्रवाह सचमुच जीवन - प्रवाह ' बन जाता है । नाना प्रकार के प्रपातों पर हिमाच्छानि से गिरती हुई जलधारा की कल्लोलें और धारा के बीच - बीच में छूटने वाले फव्वारों की जल - कणिकायें कर पल्ल सारे उपवन में नन्दन कानन की सी शोभा का सृजन कर देती हैं । मुगल - सम्राटों की विलास - प्रियता और उनका उद्यान - प्रेम आँखों के सामने साकार हो उठता है । दिन को शालीमार और निशात एवम् रात्रि को ईषत् धवन मैसूर के वृन्दावन उपवन की शोभा से बढ़कर आहलादकारी दृश्य अन्यत्र मिलना दुर्लभ है । इनकी शोभा सैलानी शब्दों में नहीं बाँधी जा सकती क्योंकि " गिरा अनयन नयन बिनु बानी ।

 " चश्मेशाही के सोते का जल अत्यन्त स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है और डल झील से ही लगी हुई । तुनिष्ठ प्रश्न नगिन झील का पानी इतना स्वच्छ है कि नीचे 10 - 15 फीट की गहराई पर उगे हुए पौधे साफ देखे जा । सकते हैं । डल झील के अनेक स्थानों का पानी भी ऐसा ही स्वच्छ है । सूर्य की रश्मियों उस अपार जल गणपतिच राशि के आवरण में छिपी हुई धरा सुन्दरी का भी स्पर्श कर ही लेती हैं । डल झील के भीतर बस्तियों भी आक बसी हुई हैं और तैरते हुए खेत भी हैं । नगिन झील से नेहरू पार्क आते समय जल के बीच में बने मकानों  राजद और दुकानों की कतारें एवम् शिकारों में बैठकर शक भाजी और फल फूल बेचती हुई काश्मीरी किन्नरियाँ आप को मिलेंगी । जल मार्ग ही इनकी सड़कें हैं और शिकारा ही इनका यान है । पास ही सब्जियों के । छोटे - बड़े अनेक खेत हैं जो झील में उगी हुई सेवार के घने हो जाने पर उसी को तह पर तह जमा कर बस बनाये गए हैं । ये खेत हिलते - डुलते हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान पर भी ले जाये जा सकते हैं । इनक  ट्रक पास ही एक ओर कमल वन है जिसमें बहुत बड़ी राशि में कमल पैदा होते हैं । पर इस समय कमलों का श्रीनगर व ऋतु न होने से यत्र - तत्र ही दिखाई दे रहे थे । शंकराचार्य की पहाड़ी के समीप ही एक छोटे से द्वीप । पर रंग - बिरंगी बत्तियों से जगमगाता हुआ नेहरू पार्क है जो स्वतंत्र भारत की देन है । यहाँ संध्या के समय  सैर करते हुए सैंकड़ों सैलानी एकत्र हो जाते हैं और विद्युत - प्रकाश में जगमगाती डल झाल । के मनोरम दृश्य का आनन्द लूटते हैं । तैराकों के लिए यहाँ तैरने का भी प्रबन्ध है । ये श्रीनगर के वे स्थल है जिनकी समता के स्थान अन्यत्र मिलने दर्लभ हैं ।




जंगलों से भरा गान शील व उसके मा विशाल उपत्यका के साथ वायुवेगाड में हिम - क्रीडा और उसके शीशले पहलगाँव की शाणा भूमि में विस प्राकतिक वैभव इस विशाल उपत्यका की चप्पा - चप्पा भमि में बिखरा पड़ा है परन्तु अमरनाथ , शेषनाग झील व उसके मार्ग में पड़ने वाले पहलगाँव की शोभा तो अद्विताय हा जगलो से भरा गुलमर्ग , किलनमर्ग और उसके शीश पर मुकुट की तरह चमकने वाले हिमाच्छादत पप एफरवाट की क्रोड़ में हिम - क्रीड़ाओं का आनन्द भी अपने में निराला है । पहलगाँव से चंदनवाड़ी तक मार्ग क साथ वायुवेग से उछल - उछल कर बहने वाले शेषनाग नाले को एवम उसके द्वारा पग - पग पर छितराई । जाने वाली दुग्ध - धवल जल की फुहारों को देख कर तो मुझे ऐसा लगा जैसे प्रसाद की कामायनी का निम्नलिखित छंद पूरी तरह उस दिन ही मेरी समझ में आया हो " उस असीम नीले अंचल में , देख किसी की मृदु मुसकान । मानो हँसी हिमालय की है , फूट चली करती कल गान ।

शब्दार्थ 




  • अहि - सर्प , 
  • क्रोङ - गोद , 
  • पाद - पद्म - चरण कमल ,
  •  कल्लोलें - कलरव , 
  • वरज - इन्कार , 
  • अबुर्द गिरि - आबु पर्वत . 
  • हिमाच्छादित - हिम से ढका हुआ ( हिमालय ) ,
  •  रजत कगार - चांदी का किनारा .
  •  कर पल्लव - कोंपल रूपी हाथ , 
  • नवनीत धवल - मक्खन की भांति सफेद , 
  • ईषत् धवल - किचित सफेद , 
  • छेटी - दूर , 
  • सैलानी - पर्यटक , 
  • अनुकृति - नकल । 

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