तुलसीदास पाठ २ सार 11 कक्षा


Wednesday, 9 October 2019





तुलसीदास पाठ २ सार 11 कक्षा 



कवि - परिचय



      हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ महाकवि तुलसीदास जी सगुण काव्य धारा में राम के उपासक थे । गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत् 1554 विक्रमी ( सन् 1497 ई० ) में उत्तरप्रदेश के बांदा जिले में राजापुर नामक गाँव में हुआ । इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था । बाल्यावस्था में ही माता - पिता का देहान्त हो जाने के कारण गुरु नरहरिदास ने ही इनका लालन - पालन किया ।

                   श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति ने रामचरित मानस जैसे दिव्य ग्रन्थ की रचना कवि द्वारा करवाई । रामचरितमानस के अतिरिक्त तुलसीदास जी की अन्य रचनाओं में विनयपत्रिका , कवितावली , गीतावली . दोहावली , जानकी मंगल और बरवै रामायण है । इनकी भक्ति की सबसे प्रधान विशेषता उनकी सर्वांगपूर्णता है । उसमें धर्म और ज्ञान का सुन्दर समन्वय है । इनके राम परमब्रहा होते हुए भी गृहस्थ थे । इन्होंने पारिवारिक सम्बन्धों के आदर्श चरित्र को हमारे सामने प्रस्तुत किया है । इन्हीं सब विशेषताओं के कारण यह कहा गया है कि "

'' कविता कर के तुलसी न लसै । 

कविता लसि पा तुलसी की कला । लखिए ।''

पाठ - परिचय 


           प्रस्तुत कविता तुलसीदासजी द्वारा रचित कवितावली के अयोध्याकांड का अंश है जो हृदयस्पर्शी एवं चित्रात्मक है । कवि ने सीता , राम व लक्ष्मण के वन गमन का वर्णन रोचक व सहज रूप से किया है । पथ पर महिलाओं का उलाहना , सीताजी द्वारा उनकी जिज्ञासाओं का शमन करना , राम का मुनिवेश धारण कर पदवेश बिना कंटीले पथ पर चलना , आदि भावों का शब्द चित्र हृदयस्पर्शी बन पड़ा है ।


वन गमन

 सवैया 
पुर तें निकसी रघुवीर - वधू , धरि धीर दये मग में डग द्वै । 

झलकी भरि भाल कनी जल की , पुट सूखि गए मधुराधर वै ।
 । फिरि बूझति है " चलनो अब केतिक , पर्न कुटी करिही कित हवै ? |
 तिय की लखि आतुरता पिय की अखियाँ अति चारु चलीं जल च्यै । 





" जल को गए लक्खन है लरिका , परिखौ , पिय ! छह घरीक वै ठाढ़ । 
पोछि पसेउ ययारि करौं , अरु पायं पखारिही भूमुरि डाढ़े ।
 । " तुलसी रघुबीर प्रिया सम जानि के बैठि विलंब लौ कंटक काढ़े । 
जानकी नाह को नेह लख्यौ , पुलक्यो तन , वारि विलोचन बादै ।। 2 । । 


ठाढ़े हैं तो दुम डार गहे , धनु कांधे धरे , कर सायक लै । 
विकटी भ्रकुटी बड़री अंखियां , अनमोल कपोलन की छवि है । 
तुलसी असि मूरति आनि हिए जड़ डारिहाँ प्रान निछावरि कै । 
। श्रम - सीकर साँवरि देह लसै मनो रासि महातम तारकमै । । 3 ।

 बनिता बनी स्यामल गौर के बीच , विलोकहु , री सखी ! मोहिंसी हवै ।
 मग जोग न , कोमल , क्यों चलिहै ? सकुचात मही पदपंकज छवै । 
। तुलसी सुनि ग्रामवधू विथकीं , पुलकी तन औ चले लोचन च्चै । 
सब भाँति मनोहर मोहन रूप , अनूप हैं भूप के बालक द्वै । । 4 । ।

 साँवरे गोरे सलोने सुभाय , मनोहरता जिति मैन लियो है ।
 बान कमान निषंग कसे , सिर सोहैं जटा , मुनिवेष कियो है । ।
 संग लिये विधु - बैनी वधू रति को जेहि रंचक रूप दियो है ।
 पौयन ती पनहीं न , पयादेहिं क्यों चलिहँ ? सकुचात हियो है । । 5 । । 

 रानी मैं जानी अजानी महा , पबि पाहन हूं ते कठोर हियो है ।
 राजहु काज अकाज न जान्यो , कह्यो तिय को जिन कान कियो है । ।
 ऐसी मनोहर मूरति ये , बिछुरे कैसे प्रीतम लोग जियो है ? ।
 ऑखिन में , सखि ! राखिबे जोग , इन्हें किमि कै बनबास दियो है ? | 16 | | 

सीस जटा , उर बाहु बिसाल , विलोचन लाल , तिरीछी सी भौहैं ।
 तून सरासन बान घरे , तुलसी वन - मारग में सुठि सोहैं । । 
सादर बारहिं वार सुभाय चितै तुम ल्यो हमरौ मन मोहैं । 
पूछति ग्रामवधू सिय सों " कहौ साँवरे से , सखि रावरे को है ? " 7 



 सनि सुन्दर बैन सुधारस - सान , सयानी  जानकी जानी भाली । 
तिरछे करे नैन दै सैन तिन्हें समुझाई कषु मुसुकाई चली । ।
 तलसी तेहि औसर सोहँ सबै अवलोकित लोचन - लाहु अली । 
अनुराग - तड़ाग में भानु उदै विगी मनो मंजुल कंज - कली । 1811


 शब्दार्थ 



  • डग - कदम ,
  • भाल - मस्तक , 
  • बूझति - पूज रखी है . 
  • . केतिक - कितना . 
  • पर्नकुटी - घास की कुटिया ,
  •  तिय - पत्नी , 
  • लखि - देखकर , 
  • पिय - पति . 
  • चारु - सुन्दर , 
  • सायक - बाण , 
  • निषंग - तरकश 
  • मग - मार्ग , 
  • पाय पखारिहौ -भूभुरि - डादेः
  •  श्रम - थकान , 
  • नाह - नाथ , 
  • स्वागी गरम बालू से जले चरणों को धो रहे है चैन - वचन , 
  • मैन - कामदेव , 
  • तारकमै - तारागण 
  • विगसी - खिली ( विकसित हुई ) 
  • औसर - अवसर 
  • सयानी - समझदार , 
  • मंजुल - मनोहर
  •  रावरे - आपके . 
  • बाहु - भुजा .
  •  जोग - योग्य 5 
  • . जलच्च - अश्रुधार प्रवाहित
  •  रंचक - तनिक हो रही है , 
  • सुधारस साने - अमृतमय , 
  • सैन - संकेत . पन
  • ही - पदवेश ( जूतियों ) .
  •  पयादेहि - पैदल ही . ....

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