सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' 11 Ncert Lesson


Thursday, 10 October 2019



सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' 11 Ncert Lesson 



 कवि - परिचय 





                             छायावादी कवियों में विलक्षण प्रतिभा के धनी सूर्यकान्त त्रिपाठी “ निराला का जन्म सन् 1897 में हआ । निराला जी ऐसे युगान्तकारी कवि रहे जिनकी कविता में तत्कालीन समाज में जी रहे मानव , जिसमें स्वयं निराला भी है , की पीड़ा , परवशता एवं परतंत्रता के प्रति तीव्र आक्रोश , अन्याय तथा असमानता । के प्रति गहरे विद्रोह की विपरीत विषम जीवन स्थितियों के प्रति संघर्ष करने की गूंज सुनायी देती कहा गया है ?

       

                      यद्यपि उन्होंने कविता के साथ उपन्यास , कहानी , आलोचना आदि विधाओं में भी लिखा किन्तु मलतः निराला कवि थे । जो जीवन के यथार्थ का चित्रण पूरी कल्पनाशीलता से करते थे । बगला . अंग्रेजी , कर श्येन को खाने संस्कृत तथा हि संस्कृत तथा हिन्दी पर उनका असाधारण अधिकार था । वे अभिव्यक्ति के लिए नये काव्य - रूप खोजते । एवं भाषा को नयी अभिव्यक्ति - भंगिमाएँ प्रदान करते थे तथा जीवन परिवर्तन का माध्यम काव्य को बनाते अनामिका , परिमल , गीतिका , तुलसीदास , कुकुरमुत्ता , अणिम , अपरा , नये पते , अर्चना , आराधना . राम की शक्ति पूजा , गीत गूंज तथा सांध्य काकली उनकी प्रसिद्ध काव्य - कृतियाँ हैं ।


              निराला जी की कला सान्दय का समस्त रचनाओं को ' निराला ग्रंथावली ' के आठ खण्डों में प्रकाशित कर दिया गया है । हिन्दी में निराला को मुक्त छन्द के प्रणेता के रूप में जाना जाता है । उनकी कविता बहुआयामी है - उसमें ओजस्वी भावों के ज्वालामुखी का विस्फोट है , तो नारी के अलौकिक एवं दिव्य सौन्दर्य का क्या है ? चित्रण है ।
   साधारण जन के कष्टों का साधारण भाषा में वर्णन है । नसी वीर माता

पाठ - परिचय ' 


                            जागो फिर एक बार ' शीर्षक से ही उन्होंने दो कविताएँ लिखी जिनमें से एक कविता में प्रातःकालीन मनोरम दृश्यों का चित्रण है और जागने का आह्वान है तो दूसरी कविता में परतन्त्रता में सुप्त , दृष्टि से उनके नि निराश भारतीय जनता को उनके गौरवमय अतीत की याद दिलाते हुए उसे जागने का आह्वान किया गया है । ?

    निराला जी प्रस्तुत कविता में यह रेखांकित करते हैं कि योग्य जन जीता है । योग्य जन जीता ह पश्चिम का ही सिद्धान्त नहीं , गीता का भी यही उद्देश्य है । कवि इस कविता में गुरु गोविन्दसिंह के आजस्वी शौर्य की याद दिलाता है जिन्होंने नारा दिया था , ' सवा लाख से एक लड़ाऊँ तब गोविन्द सिंह । नाम कहाऊँ । निराला जी इस कविता में भारतवासियों की इस प्रवृत्ति पर भी चोट करते है कि हम आध्यात्मिक क्षेत्र में तो अग्रणी बने और जीवन की नश्वरता को स्वीकारते रहे । जबकि शौर्यवान होते हुए । पराधान हो गए । निरालाजी भारतवासियों को इसी पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देते है।



     भिक्षुक नामक कविता में कवि ने भिक्षुक का शब्द चित्र प्रस्तुत करत संघर्ष का मार्मिक यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है । उसके दर्द को स्वयं कवि आत्मसात को अभिमन्यु की भीति साहसी तथा संघर्षशील होने का आहवान करता है । निक तारतम्य स्थापित किया है तथा दूषित सामाजिक संरचना पर करारा प्रहार किया है ।

***                         ***

जागो फिर एक बार 


जागो फिर एक बार ! 

समर अमर कर प्राण , 
गान गाए महासिन्धु - से
 सिन्धु - नद - तीरवासी !
 सैन्धव तुरंगों पर चतुरंग चमूसंग , 
सवा सवा लाख पर एक को चढ़ाऊंगा , 
गोविन्द सिंह निज नाम जब कहाऊंगा ,
 किसने सुनाया यह 
पीर - जन - मोहन अति 
दुर्जय - संग्राम - राग 
फाग का खेला रण 
बारहों महीने में ? 
शेरों की मांद में 
आया है आज स्यार 
                                          जागो फिर एक बार 

सत् श्री अकाल , 
भाल - अनल धक - धक कर जला ,
 भस्म हो गया था काल
 तीनों गुण ताप त्रय ,
 अभय हो गये थे तुम 
मृत्युंजय व्योमकेश के समान , 
अमृत - सन्तान ! तीव
 भेदकर सप्तावरण - मरण लोक , 


शोकहारी । पहुँचे थे वहाँ 
जहाँ आसन है सहनार 
जागो फिर एक बार ! 
सिंह की गोद से 
छीनता रे शिशु कौन ? 
मौन भी क्या रहती वह 
रहते प्राण ? रे अंजान । 
एक मेषमाता ही 
रहती है निर्निमेष 
दुर्बल वह-
 छिनती सन्तान जब 
जन्म पर अपने अभिशप्त 
तप्त आँसू बहाती है .
 किन्तु क्या . 
योग्य जन जीता है ।
 पश्चिम की उक्ति नहीं
 गीता है , गीता है 
स्मरण करो बार - बार
 जागो फिर एक बार ! 
पशु नहीं , वीर तुम ,
 समर शूर , क्रूर नहीं , 
काल - चक्र में ही दबे 
आज तुम राज - कुँवर ! समर - सरताज ! 
पर क्या है , 
सब माया है - माया है , 
मुक्त हो सदा ही तुम .
 बाधा - विहीन - बन्ध छन्द ज्यों , 
डूबे आनन्द में सच्चिदानन्द रूप 
महामन्त्र ऋषियों का 
अणुओं परमाणुओं में फूंका हुआ " 
तुम हो महान ,
 तुम सदा हो महान् है नश्वर यह दीन-भाव , 
कायरता , कामपरता ..
ब्रह्म हो तुम 
पद - रज भर भी है नहीं पूरा यह विश्व - भार " 

                                                                                               जागो फिर एक बार ! 




भिक्षुक


 वह आता -
दो टूक कलेजे के करता । 
पछताता पथ पर आता । 
पेट - पीठ दोनों मिलकर हैं एक , 
चल रहा लकुटिया टेक , 
मुठ्ठीभर दाने को , भूख मिटाने को , 
मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता
 दो टूक कलेजे के करता 
पछताता पथ पर आता । 
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये . 
बायें से वे मलते हुए पेट चलते हैं 
और दाहिना दयादृष्टि पाने की ओर बढ़ाये 
भूख से सूख ओंठ जब जाते . 
दाता - भाग्यविधाता - से क्या पाते 
घूट आँसुओं के पीकर रह जाते , 
चाट रहे जूठी पत्तल वे 
कभी सड़क पर खड़े हुए , 
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए ।
 ठहरो , अहो है मेरे हृदय में ,
 अमृत में सींच दूंगा 
अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम 
तुम्हारे दुःख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा । 

शब्दार्थ



  •  समर - युद्ध . 
  • चमू चतुरंग - सेना के चारों अंग ( हाथी , घोड़ा , पैदल , रथी ) , 
  • माँद - गुफा , 
  • अनल - आग . 
  • दुर्जय - जिसे कठिनाई से जीता 
  • तीनो गुण - सत , र जा सके .

Reactions: